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पर्वतीय राज्यों में सुशासन की चुनौतियां

प्रस्तावना:

भारत के पर्वतीय राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड में, शासन और विकास की प्रक्रिया समतल क्षेत्रों से भिन्न और अधिक जटिल है। कठिन भू-आकृति, बिखरी हुई जनसंख्या, आपदाओं की आवृत्ति तथा संसाधनों की सीमाएँ यहाँ शासन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। लोकतांत्रिक ढाँचे में जनता को बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता और संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रकार के प्रशासनिक प्रयासों की आवश्यकता होती है।

  1. कठिन भौगोलिक स्थिति और बिखरी जनसंख्या

उत्तराखंड की दुर्गम पर्वतीय स्थलाकृति और छोटी-बड़ी बस्तियों में बिखरी जनसंख्या के कारण शासन की लागत अधिक हो जाती है। सड़क, बिजली और मूलभूत सुविधाओं को हर गाँव तक पहुँचाना एक बड़ा कार्य है। परिणामस्वरूप, योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक समय और संसाधन लगते हैं।

  1. पलायन, बेरोजगारी और क्षेत्रीय असंतुलन

उत्तराखंड के युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर जाते हैं। इससे गाँव में आबादी घटती है और आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ जाती हैं। साथ ही, पहाड़ी और मैदानी जिलों के बीच विकासात्मक असमानता भी बनी रहती है, जो सामाजिक और आर्थिक असंतुलन को बढ़ाती है।

  1. सीमित संपर्क और सेवा वितरण की कठिनाई

पर्वतीय इलाकों की सीमित सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के सुचारु वितरण में बाधा डालती है। दूरस्थ गाँवों तक डॉक्टर, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी पहुँचने में कठिनाई का सामना करते हैं। इससे सेवाएँ अधूरी रह जाती हैं और नागरिक अधिकारों का हनन भी होता है।

  1. प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता और पर्यावरणीय संकट

उत्तराखंड जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था वानिकी, कृषि और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। अंधाधुंध दोहन, बांध परियोजनाएँ और अत्यधिक पर्यटन से पर्यावरणीय संकट और पारिस्थितिकीय असंतुलन बढ़ रहा है। इस कारण संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ उपयोग की नीतियाँ अनिवार्य हो जाती हैं।

  1. बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ

भूकंप, भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने जैसी आपदाएँ उत्तराखंड में लगातार आती रहती हैं। ऐसे परिदृश्य में शासन के लिए आपदा प्रबंधन और पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती है। आपदा-रोधी शासन (Disaster-resilient Governance) की कमी से भारी जनहानि और आर्थिक नुकसान होता है।

  1. नवोन्मेषी, विकेंद्रीकृत और पारिस्थितिक-संवेदनशील शासन की आवश्यकता

इन चुनौतियों से निपटने के लिए उत्तराखंड को अधिक विकेंद्रीकृत शासन, स्थानीय निकायों की भूमिका में वृद्धि तथा पर्यावरण-संवेदनशील नीतियों की आवश्यकता है। सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग, समुदाय आधारित पर्यटन, जल-संरक्षण और स्थानीय उद्यमिता को प्रोत्साहित करना उत्तराखंड के सतत विकास का मार्ग हो सकता है।

निष्कर्ष: 

उत्तराखंड में शासन की चुनौतियाँ भौगोलिक परिस्थितियों, ढाँचागत कमी, पलायन और प्राकृतिक आपदाओं से गहराई से जुड़ी हैं। यदि शासन को प्रभावी और समावेशी बनाना है तो पर्यावरण-संवेदनशील, विकेंद्रीकृत और नवोन्मेषी उपाय अपनाने होंगे। केवल तभी उत्तराखंड पर्वतीय कठिनाइयों को पार करते हुए सतत, समावेशी और सुरक्षित विकास की राह पर आगे बढ़ पाएगा। वास्तव में, सुशासन ही पहाड़ का भविष्य सुरक्षित कर सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1. उत्तराखंड में शासन की लागत अधिक होने का मुख्य कारण क्या है?

(a) बड़ी शहरी आबादी
(b) कठिन भौगोलिक स्थिति और बिखरी जनसंख्या
(c) राजनीतिक अस्थिरता
(d) उद्योगों की कमी

उत्तर: (b) कठिन भौगोलिक स्थिति और बिखरी जनसंख्या

व्याख्या: उत्तराखंड की दुर्गम पर्वतीय स्थलाकृति और गाँवों में बिखरी हुई जनसंख्या के कारण शासन की लागत बढ़ जाती है। सड़क, बिजली और मूलभूत सेवाएँ हर गाँव तक पहुँचाना कठिन और महंगा होता है। परिणामस्वरूप योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक समय व संसाधन लगते हैं।

प्रश्न 2. उत्तराखंड में पलायन और बेरोजगारी की समस्या का क्या प्रभाव पड़ता है?

(a) शहरीकरण कम होता है
(b) गांवों में आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ जाती हैं
(c) शिक्षा का स्तर घटता है
(d) राजस्व बढ़ जाता है

उत्तर: (b) गांवों में आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ जाती हैं

व्याख्या: बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन गांवों को खाली कर देता है। इससे आर्थिक गतिविधियाँ रुक जाती हैं तथा ग्रामीण क्षेत्र पिछड़ते जाते हैं। साथ ही, पहाड़ी और मैदानी इलाकों में विकासात्मक असमानता भी बढ़ती है, जिससे सामाजिक-आर्थिक असंतुलन गहराता है।

प्रश्न 3. सीमित सड़क और डिजिटल कनेक्टिविटी का सबसे बड़ा असर किस पर पड़ता है?

(a) पर्यटन पर
(b) शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी सेवाओं पर
(c) कृषि पर
(d) उद्योगों पर

उत्तर: (b) शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी सेवाओं पर

व्याख्या: उत्तराखंड में सीमित सड़क नेटवर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी के कारण स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा और सरकारी कल्याणकारी योजनाएँ दूरस्थ गाँवों तक पूरी तरह नहीं पहुँच पातीं। डॉक्टर, शिक्षक और अधिकारी वहाँ तक पहुँचने में कठिनाई महसूस करते हैं, जिससे नागरिक अधिकार प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 4. उत्तराखंड में पर्यावरणीय संकट का एक प्रमुख कारण क्या है?

(a) जनसंख्या वृद्धि
(b) अंधाधुंध संसाधन दोहन, बांध परियोजनाएँ और अत्यधिक पर्यटन
(c) उद्योगों का अभाव
(d) सीमित शहरीकरण

उत्तर: (b) अंधाधुंध संसाधन दोहन, बांध परियोजनाएँ और अत्यधिक पर्यटन

व्याख्या: उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। लेकिन अत्यधिक पर्यटन, बांध निर्माण और वनों का अंधाधुंध दोहन ने पारिस्थितिकीय संतुलन बिगाड़ दिया है। इससे पर्यावरणीय संकट गंभीर होता जा रहा है और टिकाऊ नीतियों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।

प्रश्न 5. उत्तराखंड जैसे राज्यों में सुशासन के लिए किस प्रकार का मॉडल आवश्यक है?

(a) केंद्रीकृत और केवल औद्योगिक विकास आधारित
(b) नवोन्मेषी, विकेंद्रीकृत और पर्यावरण-संवेदनशील
(c) केवल शहरी विकास आधारित
(d) केवल पारंपरिक प्रशासनिक

उत्तर: (b) नवोन्मेषी, विकेंद्रीकृत और पर्यावरण-संवेदनशील

व्याख्या: उत्तराखंड में प्रभावी शासन के लिए नवोन्मेषी, विकेंद्रीकृत और पर्यावरण-संवेदनशील नीतियों की ज़रूरत है। स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाना, समुदाय आधारित पर्यटन, जल-संरक्षण और आईसीटी का उपयोग राज्य को सतत, समावेशी और सुरक्षित विकास की दिशा में आगे ले जा सकता है।

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