उत्तराखंड का लोक संगीत अपनी विशिष्ट ध्वनियों और लय के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ के पारंपरिक वाद्य यंत्र न केवल संगीत को माधुर्य प्रदान करते हैं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के जीवंत वाहक भी हैं।
- सांस्कृतिक पहचान: उत्तराखंड के वाद्य यंत्र यहाँ की जीवनशैली, युद्ध कौशल और धार्मिक अनुष्ठानों के अभिन्न अंग हैं। इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों—ताल (चमड़े वाले), सुषिर (फूँक वाले) और तार (तंतु वाले) में विभाजित किया गया है।
- राज्य वाद्य यंत्र (ढोल): वर्ष 2015 में ‘ढोल’ को उत्तराखंड का राजकीय वाद्य यंत्र घोषित किया गया। यह तांबे या पीतल की धातु पर बकरी की खाल मढ़कर बनाया जाता है।
- मंगल वाद्य: ढोल को राज्य में ‘मंगल वाद्य’ माना जाता है। इसके बिना कोई भी शुभ कार्य, पूजा या उत्सव पूर्ण नहीं माना जाता। यह ‘ढोल सागर’ नामक प्राचीन ग्रंथ की तालों पर आधारित है।
- ढोल सागर और उत्तम दास: ढोल बजाने की कला एक संपूर्ण विज्ञान है। उत्तम दास जी को ढोल सागर का सबसे बड़ा ज्ञाता माना जाता है, जिन्होंने इस लुप्त होती विधा को संरक्षित किया है।
- दमाऊँ (युगल वाद्य): यह ढोल के साथ संगत करने वाला अनिवार्य वाद्य है। तांबे की अर्ध-गोलाकार कटोरी पर चमड़ा मढ़कर बने इस वाद्य को दो डंडियों से बजाया जाता है, जो संगीत में गूँज (Base) पैदा करता है।
- हुड़का (कुमाऊँ की धड़कन): डमरू के आकार का यह वाद्य यंत्र हाथ की थाप से बजाया जाता है। कुमाऊँ में ‘हुड़किया बौल‘ (धान रोपाई के गीत) के समय इसका प्रयोग अनिवार्य है।
- जागर और हुड़का: गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों में ‘जागर’ (देवताओं के आह्वान) के समय हुड़का मुख्य वाद्य की भूमिका निभाता है, जिसकी ध्वनि श्रोताओं में आध्यात्मिक ऊर्जा भर देती है।
- डौंर-थाली: डौंर एक छोटा डमरू जैसा वाद्य है जिसे थाली (कांसे की) के साथ बजाया जाता है। यह संयोजन विशेष रूप से तांत्रिक अनुष्ठानों और विशिष्ट जागरों में प्रयोग होता है।
- मंजीरा और झांझ: ये धातु से बने ताल वाद्य हैं जो भजन-कीर्तन और सामूहिक लोक नृत्यों के दौरान लय और गति को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
- रणसिंघा (शौर्य का प्रतीक): तांबे से बना यह लंबा और मुड़ा हुआ सुषिर वाद्य है। प्राचीन काल में इसका उपयोग युद्ध के समय ‘रणभेरी‘ के रूप में किया जाता था।
- तुरही: रणसिंघा के समान ही तुरही भी एक फूँक वाद्य है। इसका उपयोग राजसी घोषणाओं और धार्मिक यात्राओं (जैसे नंदा देवी राजजात) में उद्घोष के लिए किया जाता है।
- मशकबीन (बैगपाइप): मूलतः स्कॉटिश मूल का यह वाद्य यंत्र अब उत्तराखंड की संस्कृति में इस कदर रच-बस गया है कि यह यहाँ के पहाड़ी विवाहों की मुख्य पहचान बन चुका है।
- बांसुरी (मुरली): बाँस से बनी मुरली चरवाहों और स्थानीय युवाओं का प्रिय वाद्य है, जो पहाड़ों की शांत वादियों में प्रेम और विरह के गीतों को स्वर देती है।
- अलगोजा: यह दो नलियों वाली बांसुरी है। नर्तक या वादक एक साथ दोनों नलियों को मुँह में रखकर बजाते हैं, जिससे अत्यंत सुरीली और जटिल धुनें उत्पन्न होती हैं।
- नागफणी: सर्प के फन की आकृति वाला यह वाद्य यंत्र मुख्य रूप से साधु-संतों द्वारा धार्मिक जुलूसों में बजाया जाता है।
- सारंगी: लकड़ी और तारों से बना यह वाद्य यंत्र लोकगीतों, विशेषकर ‘बैठकी होली’ में शास्त्रीय पुट प्रदान करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
- एकतारा: लौकी के तुम्बे से बना एक तार वाला यह वाद्य भजन और सूफी गायन के दौरान एक अनवरत स्वर (Drone) प्रदान करने के लिए उपयोग किया जाता है।
- बिणाई (अनोखा वाद्य): लोहे का बना यह छोटा सा वाद्य यंत्र दांतों के बीच दबाकर बजाया जाता है। उंगली के प्रहार और मुँह के कंपन से इससे निकलने वाली ‘क्लिक’ जैसी ध्वनि बहुत आकर्षक होती है।
- वाद्य यंत्र निर्माण: इन यंत्रों का निर्माण स्थानीय शिल्पकारों द्वारा ताम्र, पीतल, बाँस और पशु खाल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से किया जाता है, जो ‘वोकल फॉर लोकल’ का बेहतरीन उदाहरण है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड के लोक वाद्य यंत्र केवल ध्वनि उत्पन्न करने वाले उपकरण नहीं हैं, बल्कि ये ‘देवभूमि’ के जन-मानस की भावनाओं, इतिहास और श्रद्धा की अभिव्यक्ति हैं। इनका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए अनिवार्य है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1: उत्तराखंड के राजकीय वाद्य यंत्र ‘ढोल‘ के बारे में क्या सत्य है?
- वर्ष 2015 में इसे उत्तराखंड का राजकीय वाद्य यंत्र घोषित किया गया।
- यह तांबे या पीतल की धातु पर बकरी की खाल मढ़कर बनाया जाता है।
- इसे राज्य में ‘मंगल वाद्य’ माना जाता है, जिसके बिना शुभ कार्य पूर्ण नहीं होते।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 2: ‘ढोल सागर‘ और इसके वादन के संबंध में कौन से तथ्य सही हैं?
- ‘ढोल सागर’ ढोल वादन की कला पर आधारित एक प्राचीन ग्रंथ है।
- उत्तम दास जी को ढोल सागर का सबसे बड़ा ज्ञाता माना जाता है।
- ढोल वादन की कला एक संपूर्ण विज्ञान है जिसमें विभिन्न तालों का महत्व है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 3: ‘दमाऊँ‘ (Damau) वाद्य यंत्र की क्या विशेषताएँ हैं?
- यह ढोल के साथ संगत करने वाला एक अनिवार्य युगल वाद्य है।
- यह तांबे की अर्ध-गोलाकार कटोरी पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है।
- इसे दो डंडियों से बजाया जाता है और यह संगीत में गूँज (Base) पैदा करता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 4: ‘हुड़का‘ (HurkA. के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?
- यह डमरू के आकार का वाद्य यंत्र है जो हाथ की थाप से बजाया जाता है।
- कुमाऊँ में ‘हुड़किया बौल’ (धान रोपाई के गीत) के समय इसका प्रयोग अनिवार्य है।
- यह जागर (देवताओं के आह्वान) के समय मुख्य वाद्य की भूमिका निभाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 5: ‘रणसिंघा‘ (RansinghA. और ‘तुरही‘ जैसे सुषिर वाद्यों का क्या महत्व है?
- रणसिंघा तांबे से बना शौर्य का प्रतीक है जिसे प्राचीन काल में ‘रणभेरी’ के रूप में बजाया जाता था।
- तुरही का उपयोग राजसी घोषणाओं और धार्मिक यात्राओं (जैसे नंदा देवी राजजात) में होता है।
- ये दोनों फूँक मारकर बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 6: ‘मशकबीन‘ (Bagpipe) के बारे में उत्तराखंड की संस्कृति में क्या विशेष है?
- यह मूलतः स्कॉटिश मूल का वाद्य यंत्र है।
- यह अब उत्तराखंड के पहाड़ी विवाहों की एक मुख्य पहचान बन चुका है।
- यह विदेशी मूल का होने के बावजूद यहाँ की संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गया है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 7: ‘अलगोजा‘ (AlgozA. और ‘मुरली‘ के संबंध में क्या सत्य है?
- मुरली बाँस से बनी होती है जो पहाड़ों में प्रेम और विरह के गीतों को स्वर देती है।
- अलगोजा दो नलियों वाली बांसुरी है जिसे एक साथ मुँह में रखकर बजाया जाता है।
- ये दोनों ही फूँक (सुषिर) श्रेणी के वाद्य यंत्र हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 8: ‘डौंर-थाली‘ और ‘मंजीरा‘ का उपयोग किन कार्यों में किया जाता है?
- डौंर-थाली का संयोजन विशेष रूप से तांत्रिक अनुष्ठानों और जागरों में होता है।
- मंजीरा और झांझ का उपयोग भजन-कीर्तन में लय को नियंत्रित करने के लिए होता है।
- ये वाद्य यंत्र सामूहिक लोक नृत्यों के दौरान गति प्रदान करते हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 9: उत्तराखंड के अनोखे वाद्य यंत्र ‘बिणाई‘ (Binai) की क्या विशेषता है?
- यह लोहे का बना एक छोटा सा वाद्य यंत्र है।
- इसे दांतों के बीच दबाकर और उंगली के प्रहार से बजाया जाता है।
- इससे निकलने वाली ‘क्लिक’ जैसी ध्वनि बहुत आकर्षक होती है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 10: उत्तराखंड के लोक वाद्यों के निर्माण और महत्व के बारे में क्या सही है?
- इनका निर्माण स्थानीय शिल्पकारों द्वारा ताम्र, पीतल, बाँस और पशु खाल से किया जाता है।
- ये वाद्य यंत्र ‘वोकल फॉर लोकल’ का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
- ये यंत्र देवभूमि के इतिहास, श्रद्धा और जन-मानस की भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी