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उत्तराखंड में फिल्म और नाट्यकला: एक ऐतिहासिक यात्रा

उत्तराखंड की कलात्मक यात्रा इसके नैसर्गिक सौंदर्य, पारंपरिक लोकनाट्यों और उभरते हुए क्षेत्रीय सिनेमा का एक अद्भुत संगम है। राज्य ने अपनी ‘जगवाल’ से लेकर यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त ‘रम्माण’ तक, विश्व पटल पर अपनी सांस्कृतिक छाप छोड़ी है।

  1. क्षेत्रीय सिनेमा का उदय: उत्तराखंड में क्षेत्रीय फिल्मों की शुरुआत 1980 के दशक में हुई। जगवाल‘ (1983) राज्य की पहली गढ़वाली फिल्म थी, जिसका निर्माण पारेश्वर गौड़ ने किया था। ‘जगवाल’ का अर्थ होता है—प्रतीक्षा।
  2. कुमाऊँनी सिनेमा: कुमाऊँनी भाषा की पहली फिल्म मेघा आ‘ (1987) मानी जाती है, जिसके निर्माता जीवन सिंह बिष्ट थे। यह फिल्म कुमाऊँ की लोक संस्कृति को पर्दे पर लाने का पहला बड़ा प्रयास था।
  3. ऐतिहासिक सफलता – घरजवैं: 1985 में रिलीज़ हुई घरजवैं उत्तराखंड की सबसे सफल और लोकप्रिय फिल्म मानी जाती है। विश्वेश्वर दत्त नौटियाल के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने दिल्ली के सिनेमाघरों में कई हफ्तों तक चलने का रिकॉर्ड बनाया था।
  4. राष्ट्रीय स्तर पर पहचान: गढ़वाली फिल्म सुबेरो घाम ने अपनी सशक्त पटकथा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सराहना प्राप्त की, जिसने राज्य की गंभीर सामाजिक समस्याओं, जैसे शराबबंदी, को उजागर किया।
  5. आंदोलन पर आधारित सिनेमा: उत्तराखंड राज्य आंदोलन की पीड़ा और संघर्ष को तेरी सौं‘ (2003) जैसी फिल्मों में बखूबी दिखाया गया है, जिसके निर्देशक अनुज जोशी थे।
  6. बॉलीवुड का आकर्षण: उत्तराखंड की वादियों में शूट हुई पहली प्रमुख फिल्म ‘मधुमती’ (1958) थी। इसके बाद ‘सिलसिला’, ‘ताल’, ‘केदारनाथ’ और ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ जैसी सैकड़ों फिल्मों ने नैनीताल, ऋषिकेश और औली को वैश्विक पहचान दिलाई।
  7. फिल्म फ्रेंडली स्टेट: उत्तराखंड को 2018 और 2019 में भारत के मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जो राज्य की सुगम शूटिंग नीतियों और प्राकृतिक लोकेशन्स का प्रमाण है।
  8. फिल्म विकास परिषद: 2016 में ‘उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद’ का गठन किया गया, जो क्षेत्रीय फिल्मों को सब्सिडी देने और बाहरी फिल्म निर्माताओं को ‘सिंगल विंडो’ क्लीयरेंस प्रदान करने का कार्य करती है।
  9. अमूर्त धरोहर – रम्माण: चमोली के सलूड़-डूंगरा गाँव का लोकनाट्य रम्माण विश्वविख्यात है। इसे 2 अक्टूबर 2009 को यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया गया।
  10. पांडव लीला: गढ़वाल का यह पारंपरिक नाट्य रूप महाभारत की कथाओं पर आधारित है। इसमें ग्रामीण कलाकार पांडवों का स्वांग रचते हैं और ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य-मंचन करते हैं।
  11. हिलजात्रा (पिथौरागढ़): यह कुमाऊँ की सोर घाटी का प्रसिद्ध मुखौटा नाट्य है, जो मूलतः कृषि और पशुपालन से जुड़ा है। इसका मुख्य पात्र लखिया भूत (भगवान शिव का गण) आकर्षण का केंद्र होता है।
  12. अल्मोड़ा की रामलीला: अल्मोड़ा की रामलीला अपनी विशिष्ट गायन शैली और अभिनय के लिए ‘यूनेस्को’ द्वारा प्रशंसित है। इसे दुनिया की सबसे पुरानी संगीतमय रामलीला शैलियों में गिना जाता है।
  13. मोहन उप्रेती का योगदान: उत्तराखंड के आधुनिक रंगमंच को पहचान दिलाने में मोहन उप्रेती का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने ‘पर्वतीय कला केंद्र’ के माध्यम से लोक संगीत और नाटकों को दिल्ली जैसे महानगरों तक पहुँचाया।
  14. जनकवि गिर्दा: गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ एक क्रांतिकारी रंगकर्मी और कवि थे। उनके नाटकों ने जन-आंदोलनों और सामाजिक चेतना को स्वर दिया।
  15. मुखौटा परंपरा: राज्य की नाट्यकला में लकड़ी के मुखौटों का प्रयोग विशेष है। ये मुखौटा नृत्य न केवल मनोरंजन हैं, बल्कि ये धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे मुखौटा नृत्य-सालम) का अनिवार्य अंग हैं।
  16. रणभूत कौथिग: टिहरी और आसपास के क्षेत्रों में वीर शहीदों की स्मृति में होने वाला यह नाट्य-नृत्य वीरता और शौर्य की परंपरा को जीवित रखता है।
  17. कौरव लीला: उत्तरकाशी के कुछ क्षेत्रों में पांडवों के साथ-साथ कौरवों की कथाओं पर आधारित नाट्य मंचन की भी अनूठी परंपरा है।
  18. संगीत का प्रभाव: लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी और हीरा सिंह राणा ने अपने गीतों के माध्यम से क्षेत्रीय फिल्मों और नाटकों को एक नई ऊंचाई और पहचान प्रदान की है।
  19. आधुनिक चुनौतियाँ: वर्तमान में क्षेत्रीय सिनेमा को वितरकों की कमी और मल्टीप्लेक्स के अभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसे डिजिटल प्लेटफॉर्म (OTT) के जरिए दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

निष्कर्ष:

उत्तराखंड की फिल्में और नाटक यहाँ की ‘पहाड़ी’ अस्मिता के रक्षक हैं। ‘जगवाल’ से शुरू हुआ यह सफर अब आधुनिक तकनीकों के साथ मिलकर राज्य की गौरवशाली संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचा रहा है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: उत्तराखंड की पहली क्षेत्रीय फिल्म जगवाल‘ (1983) के संदर्भ में क्या सत्य है?

  1. यह राज्य की पहली गढ़वाली फिल्म थी।
  2. इसके निर्माता पारेश्वर गौड़ थे।
  3. ‘जगवाल’ शब्द का अर्थ ‘प्रतीक्षा’ होता है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 2: कुमाऊँनी सिनेमा के इतिहास के बारे में कौन से तथ्य सही हैं?

  1. ‘मेघा आ’ (1987) कुमाऊँनी भाषा की पहली फिल्म मानी जाती है।
  2. इसके निर्माता जीवन सिंह बिष्ट थे।
  3. यह फिल्म कुमाऊँ की लोक संस्कृति को पर्दे पर लाने का पहला बड़ा प्रयास था।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 3: फिल्म घरजवैं‘ (1985) की सफलताओं के बारे में क्या सही है?

  1. यह उत्तराखंड की अब तक की सबसे सफल और लोकप्रिय फिल्म मानी जाती है।
  2. इसका निर्देशन विश्वेश्वर दत्त नौटियाल ने किया था।
  3. इसने दिल्ली के सिनेमाघरों में कई हफ्तों तक चलने का रिकॉर्ड बनाया था।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 4: उत्तराखंड की किन फिल्मों ने सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों को स्वर दिया?

  1. ‘सुबेरो घाम’ (सामाजिक समस्या – शराबबंदी पर आधारित)।
  2. ‘तेरी सौं’ (उत्तराखंड राज्य आंदोलन के संघर्ष पर आधारित)।
  3. ये फिल्में राज्य की अस्मिता और समस्याओं को उजागर करती हैं।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 5: उत्तराखंड को फिल्म निर्माण के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कौन सी पहचान मिली है?

  1. 2018 और 2019 में इसे ‘मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
  2. 2016 में ‘उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद’ का गठन किया गया।
  3. यहाँ बाहरी फिल्म निर्माताओं को ‘सिंगल विंडो’ क्लीयरेंस की सुविधा दी जाती है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 6: चमोली जिले के प्रसिद्ध लोकनाट्य रम्माण‘ (Ramman) के बारे में क्या सत्य है?

  1. यह सलूड़-डूंगरा गाँव का एक विश्वविख्यात लोकनाट्य है।
  2. इसे 2 अक्टूबर 2009 को यूनेस्को (UNESCO) द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया गया।
  3. यह मुखौटा नृत्य और लोक मान्यताओं का एक अद्भुत संगम है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 7: पिथौरागढ़ की सोर घाटी के प्रसिद्ध हिलजात्रा‘ (HilljatrA. नाट्य की विशेषताएँ क्या हैं?

  1. यह मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन से जुड़ा मुखौटा नाट्य है।
  2. इसका मुख्य पात्र ‘लखिया भूत’ (शिव का गण) आकर्षण का केंद्र होता है।
  3. यह कुमाऊँ क्षेत्र की एक प्राचीन और विशिष्ट नाट्य परंपरा है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 8: उत्तराखंड की रंगमंच परंपरा को जीवंत रखने में किन महान व्यक्तित्वों का योगदान रहा है?

  1. मोहन उप्रेती (पर्वतीय कला केंद्र के माध्यम से लोक संगीत को बढ़ावा दिया)।
  2. गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (क्रांतिकारी रंगकर्मी और जनकवि)।
  3. इन कलाकारों ने पहाड़ी लोकनाटकों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 9: ‘अल्मोड़ा की रामलीलाके विश्व स्तर पर प्रसिद्ध होने का क्या कारण है?

  1. यह अपनी विशिष्ट गायन शैली और अभिनय के लिए जानी जाती है।
  2. यूनेस्को द्वारा इसे दुनिया की सबसे पुरानी संगीमतय रामलीलाओं में गिना गया है।
  3. यह कुमाऊँनी संस्कृति की एक गौरवशाली नाट्य विधा है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 10: उत्तराखंड के पारंपरिक लोकनाट्यों में और क्या शामिल है?

  1. पांडव लीला (महाभारत की कथाओं और ढोल-दमाऊ की थाप पर आधारित)।
  2. रणभूत कौथिग (वीर शहीदों की स्मृति में होने वाला नाट्य-नृत्य)।
  3. कौरव लीला (उत्तरकाशी क्षेत्र में प्रचलित विशेष नाट्य मंचन)।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

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