उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता यहाँ आयोजित होने वाले असंख्य मेलों और त्योहारों में स्पष्ट रूप से झलकती है। “देवभूमि” के ये उत्सव न केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं, बल्कि ये प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक सद्भाव का भी संदेश देते हैं।
- सांस्कृतिक विविधता: उत्तराखंड के त्योहारों को मुख्य रूप से मौसमी परिवर्तनों, कृषि चक्रों, पौराणिक गाथाओं और स्थानीय लोक देवताओं की आराधना के आधार पर मनाया जाता है।
- हरेला (प्रकृति का पर्व): मुख्यतः कुमाऊँ में मनाया जाने वाला यह त्योहार हरियाली और समृद्धि का प्रतीक है। इसमें पाँच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं, जिन्हें ‘हरेला’ कहा जाता है।
- फूलदेई (लोक बाल पर्व): चैत्र मास की संक्रांति पर छोटे बच्चे घरों की देहरी पर फूल चढ़ाकर खुशहाली की कामना करते हैं। यह वसंत के स्वागत का एक अनूठा पारंपरिक तरीका है।
- मकर संक्रांति (घुघुतिया): कुमाऊँ में इसे ‘घुघुतिया’ के रूप में मनाया जाता है, जहाँ आटे के पकवान (घुघुते) बनाकर कौवों को खिलाने की अनूठी परंपरा है। बागेश्वर में इसी समय प्रसिद्ध ‘उत्तरायणी मेला’ लगता है।
- घी संक्रांति (ओलगिया): फसलों के पकने की खुशी में मनाए जाने वाले इस पर्व पर घी का सेवन अनिवार्य माना जाता है। यह पशुधन और कृषि संपदा की वृद्धि का उत्सव है।
- बग्वाल (दीपावली): उत्तराखंड में दीपावली को ‘बग्वाल’ कहा जाता है। गढ़वाल के कई क्षेत्रों में इस अवसर पर ‘भैला’ (जलती लकड़ी के गट्ठर) घुमाने का साहसिक खेल खेला जाता है।
- नंदा देवी राजजात यात्रा: प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाली यह लगभग 280 किमी की पैदल यात्रा विश्व की सबसे लंबी धार्मिक यात्राओं में से एक है। इसमें चार सींगों वाला मेढ़ा (खाडू) यात्रा का नेतृत्व करता है।
- कुंभ मेला (हरिद्वार): गंगा तट पर प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाला यह मेला विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम है, जिसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया गया है।
- गौचर मेला (चमोली): 1943 में शुरू हुआ यह मेला ऐतिहासिक रूप से एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है, जो अब सांस्कृतिक और औद्योगिक प्रदर्शनी के रूप में प्रसिद्ध है।
- झंडा मेला (देहरादून): गुरु राम राय के जन्मदिवस पर आयोजित यह मेला देहरादून की ऐतिहासिक पहचान है, जहाँ देश-विदेश से श्रद्धालु ‘निशान साहब’ के दर्शन हेतु आते हैं।
- देवीधुरा का बग्वाल (पाषाण युद्ध): चम्पावत के माँ बाराही मंदिर में रक्षाबंधन के दिन ‘बग्वाल’ खेली जाती है, जिसमें पारंपरिक रूप से पत्थरों से युद्ध किया जाता था (अब प्रतीकात्मक फूलों/फलों से)।
- जौलजीबी मेला (पिथौरागढ़): काली और गोरी नदियों के संगम पर आयोजित यह मेला भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों का गवाह है।
- पूर्णागिरी मेला (चम्पावत): टनकपुर के पास स्थित पूर्णागिरी शक्तिपीठ पर चैत्र नवरात्रि में लगने वाला यह मेला उत्तर भारत के सबसे बड़े धार्मिक मेलों में गिना जाता है।
- जाख मेला (रुद्रप्रयाग): बैशाखी पर आयोजित इस मेले की सबसे अनूठी विशेषता ‘जलते अंगारों पर नृत्य’ है, जो दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देता है।
- नंदा देवी मेला (अल्मोड़ा/नैनीताल): सितंबर माह में आयोजित यह मेला कुमाऊँ की अधिष्ठात्री देवी नंदा को समर्पित है और कुमाऊँनी संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।
- माघ मेला (उत्तरकाशी): मकर संक्रांति से शुरू होने वाला यह आठ दिवसीय मेला उत्तरकाशी की धार्मिक और व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र है, जहाँ स्थानीय देवता अपनी डोलियों के साथ पहुँचते हैं।
- विशिष्ट जनजातीय मेले: उत्तरकाशी का ‘लोसर मेला’ (जाड़ भोटिया) और धारचूला का ‘कंडाली उत्सव’ (प्रत्येक 12 वर्ष) राज्य की जनजातीय संस्कृति की अनूठी झलक प्रस्तुत करते हैं।
- उत्तराखंड की होली: कुमाऊँ की ‘बैठकी’ और ‘खड़ी होली’ अपनी शास्त्रीय गायकी के लिए प्रसिद्ध है, जो राज्य के अन्य हिस्सों से अलग एक विशेष सांस्कृतिक पहचान रखती है।
- जागड़ा (महासू देवता पर्व): जौनसार-बावर क्षेत्र में भाद्रपद मास में महासू देवता के सम्मान में मनाया जाने वाला यह पर्व जनजातीय आस्था का महापर्व है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड के ये उत्सव ‘अनेकता में एकता’ का जीवंत उदाहरण हैं। ये न केवल मनोरंजन प्रदान करते हैं, बल्कि राज्य की प्राचीन विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम भी हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1: ‘घी संक्रांति‘ (OlagiA. पर्व के संदर्भ में क्या सही है?
- यह फसलों के पकने की खुशी में मनाया जाता है।
- इस दिन घी का सेवन अनिवार्य माना जाता है।
- यह उत्सव पशुधन और कृषि संपदा की वृद्धि का प्रतीक है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 2: उत्तराखंड में ‘बग्वाल‘ (दीपावली) के अवसर पर कौन सा साहसिक खेल खेला जाता है?
- भैला घुमाना (जलती लकड़ी के गट्ठर)
- पाषाण युद्ध
- अंगारों पर नृत्य
- उपरोक्त सभी
उत्तर: A. भैला घुमाना
(नोट: देवीधुरा वाली ‘बग्वाल‘ में पाषाण युद्ध होता है, लेकिन दीपावली वाली बग्वाल में ‘भैला‘ प्रमुख है।)
प्रश्न 3: चमोली के ऐतिहासिक ‘गौचर मेले‘ के बारे में क्या सत्य है?
- इसकी शुरुआत वर्ष 1943 में हुई थी।
- यह ऐतिहासिक रूप से एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है।
- वर्तमान में यह सांस्कृतिक और औद्योगिक प्रदर्शनी के रूप में प्रसिद्ध है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 4: देहरादून के ऐतिहासिक ‘झंडा मेले‘ की पहचान क्या है?
- यह गुरु राम राय के जन्मदिवस पर आयोजित होता है।
- यहाँ देश-विदेश से श्रद्धालु ‘निशान साहब’ के दर्शन हेतु आते हैं।
- यह नगर की ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान का केंद्र है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 5: पिथौरागढ़ के ‘जौलजीबी मेले‘ का महत्व किन कारणों से है?
- यह काली और गोरी नदियों के संगम पर आयोजित होता है।
- यह भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने व्यापारिक संबंधों का गवाह है।
- यह कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्र का प्रमुख सांस्कृतिक मेला है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 6: चम्पावत के ‘पूर्णागिरी मेले‘ की विशेषता क्या है?
- यह टनकपुर के पास पूर्णागिरी शक्तिपीठ पर आयोजित होता है।
- यह चैत्र नवरात्रि के अवसर पर लगता है।
- इसे उत्तर भारत के सबसे बड़े धार्मिक मेलों में गिना जाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 7: कुमाऊँ की ‘होली‘ राज्य के अन्य हिस्सों से किस प्रकार भिन्न है?
- यहाँ की ‘बैठकी होली’ अपनी शास्त्रीय गायकी के लिए प्रसिद्ध है।
- यहाँ ‘खड़ी होली’ का विशेष प्रचलन है।
- यह अपनी अनूठी सांस्कृतिक और गायन शैली के लिए जानी जाती है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 8: उत्तरकाशी के ‘माघ मेले‘ के बारे में कौन से तथ्य सही हैं?
- यह मकर संक्रांति से शुरू होने वाला आठ दिवसीय मेला है।
- यहाँ स्थानीय देवता अपनी डोलियों के साथ पहुँचते हैं।
- यह उत्तरकाशी की धार्मिक और व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 9: ‘नंदा देवी मेला‘ (अल्मोड़ा/नैनीताल) किन विशेषताओं को समेटे हुए है?
- यह कुमाऊँ की अधिष्ठात्री देवी नंदा को समर्पित है।
- यह सितंबर माह में आयोजित होने वाला प्रमुख उत्सव है।
- इसे कुमाऊँनी संस्कृति का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 10: ‘जागड़ा‘ उत्सव किस क्षेत्र और समुदाय की आस्था का महापर्व है?
- जौनसार-बावर क्षेत्र
- महासू देवता के सम्मान में भाद्रपद मास में आयोजित
- यह जनजातीय आस्था का प्रमुख केंद्र है
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी