उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान उसके जीवंत लोक नृत्यों और हृदयस्पर्शी लोकगीतों में रची-बसी है। हिमालय की गोद में विकसित यह कला परंपरा न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि यह यहाँ के कठिन जीवन, अटूट आस्था और प्रकृति प्रेम का प्रतिबिंब है।
- सांस्कृतिक आत्मा: उत्तराखंड के लोक नृत्य और संगीत मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों, कृषि चक्रों, वीर गाथाओं और सामाजिक उत्सवों से जुड़े हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होते रहे हैं।
- छोलिया नृत्य (कुमाऊँ): यह एक प्रसिद्ध युद्ध-नृत्य शैली है, जिसमें नर्तक पारंपरिक सैनिकों की वेशभूषा में ढाल-तलवार के साथ वीरता का प्रदर्शन करते हैं। यह शौर्य और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है।
- पांडव नृत्य (गढ़वाल): महाभारत के पात्रों की स्मृति में किया जाने वाला यह नृत्य-नाटिका शैली का नृत्य है। इसमें पांडवों के जीवन और उनकी वीरता के प्रसंगों को ढोल-दमाऊ की थाप पर जीवंत किया जाता है।
- झुमैलो और खुदेड़: ये नृत्य और गीत विरह प्रधान होते हैं। विवाहित कन्याओं द्वारा मायके की याद में गाए जाने वाले ये गीत और नृत्य हिमालयी महिलाओं की भावनाओं को स्वर देते हैं।
- चांचरी या झोड़ा: यह कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों का लोकप्रिय सामूहिक नृत्य है। इसमें स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर गोलाकार घेरे में नृत्य करते हैं, जिसके बीच में ‘हुड़किया’ गायक गीत का नेतृत्व करता है।
- लंगवीर नृत्य: यह टिहरी गढ़वाल का एक साहसिक नृत्य है, जिसमें नर्तक एक ऊँचे खंभे के सिरे पर पेट के बल संतुलन बनाकर विभिन्न कलाबाजियाँ दिखाता है।
- जागर नृत्य: यह एक अनुष्ठानिक नृत्य है जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। इसमें ‘जगरिया’ ढोल-दमाऊ या डौंर-थाली के माध्यम से देवताओं की गाथा गाता है।
- हारुल और बुड़ियात: जौनसार-बावर क्षेत्र के ये नृत्य पांडवों की परंपरा से जुड़े हैं। हारुल नृत्य में स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से भाग लेते हैं, जबकि बुड़ियात मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
- थड़िया और चौंफुला: गढ़वाल के ये नृत्य वसंत ऋतु और उल्लास के प्रतीक हैं। चौंफुला एक श्रृंगार प्रधान नृत्य है, जिसे स्त्री-पुरुष जोड़ियों में करते हैं।
- मांगल गीत: विवाह, नामकरण और जनेऊ जैसे संस्कारों पर गाए जाने वाले ये आशीर्वादात्मक गीत हैं। इनमें गणेश वंदना और देवी-देवताओं की स्तुति मुख्य होती है।
- वीर गाथाएँ (पवाड़े): उत्तराखंड के लोक संगीत में स्थानीय नायकों जैसे कालू भंडारी और तीलू रौतेली की वीरता के किस्से गीतों के माध्यम से सुनाए जाते हैं, जो युवा पीढ़ी को प्रेरित करते हैं।
- बाजुबंद गीत: यह रंवाई-जौनपुर क्षेत्र का प्रसिद्ध प्रेम संवाद गीत है, जिसे अक्सर प्रकृति की गोद में ऊँचे पहाड़ों पर पेड़ों के नीचे बैठकर गाया जाता है।
- हुड़किया बौल (कुमाऊँ): यह एक श्रम गीत है जो विशेष रूप से धान की रोपाई के समय गाया जाता है। गायक हुड़का बजाते हुए वीरों की गाथा गाता है, जिससे खेतों में काम कर रहे लोगों का उत्साह बना रहता है।
- होली गायन: कुमाऊँ की ‘बैठकी होली’ और ‘खड़ी होली’ शास्त्रीय और लोक संगीत का अद्भुत मिश्रण है, जहाँ गीतों के माध्यम से राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है।
- राजकीय वाद्ययंत्र (ढोल): वर्ष 2015 में ढोल को उत्तराखंड का राजकीय वाद्ययंत्र घोषित किया गया। ‘ढोल सागर’ के ज्ञाता ढोल की विभिन्न तालों के माध्यम से पूजा से लेकर शोक तक की भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
- दमाऊँ और हुड़का: ढोल के साथ संगत करने वाला छोटा वाद्य ‘दमाऊँ’ और डमरू के आकार का ‘हुड़का’ राज्य के लोक संगीत की लय निर्धारित करते हैं।
- सुषिर वाद्य (तुरही और रणसिंघा): पीतल या तांबे से बने ये वाद्ययंत्र फूँक मारकर बजाए जाते हैं। रणसिंघा का उपयोग प्राचीन काल में युद्ध घोष के लिए और अब मांगलिक कार्यों में किया जाता है।
- मशकबीन (Bagpipe): मूलतः विदेशी होने के बावजूद मशकबीन उत्तराखंड के लोक संगीत और विशेषकर विवाह समारोहों का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।
- नृत्य-संगीत का संरक्षण: वर्तमान में प्रीतम भरतवाण, नरेंद्र सिंह नेगी और बसंती बिष्ट जैसे कलाकारों ने उत्तराखंड के लोक संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुँचाया है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड का नृत्य और संगीत केवल सुर और ताल नहीं है, बल्कि यह हिमालयी संस्कृति की धड़कन है। इन कलाओं के माध्यम से राज्य की सामूहिक स्मृति और परंपराएँ आज भी सुरक्षित और जीवंत हैं।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1: कुमाऊँ के प्रसिद्ध ‘छोलिया नृत्य‘ (Choliya Dance) की क्या विशेषताएँ हैं?
- यह एक प्रसिद्ध युद्ध-नृत्य शैली है।
- इसमें नर्तक पारंपरिक सैनिकों की वेशभूषा में ढाल-तलवार के साथ वीरता का प्रदर्शन करते हैं।
- यह शौर्य और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 2: ‘पांडव नृत्य‘ (Pandav NrityA. के संबंध में कौन से तथ्य सही हैं?
- यह महाभारत के पात्रों की स्मृति में किया जाने वाला नृत्य-नाटिका शैली का नृत्य है।
- इसमें पांडवों की वीरता के प्रसंगों को जीवंत किया जाता है।
- यह मुख्य रूप से ढोल-दमाऊ की थाप पर किया जाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 3: उत्तराखंड के लोक संगीत में ‘विरह प्रधान‘ (जुदाई के दुख वाले) गीत और नृत्य कौन से हैं?
- झुमैलो
- खुदेड़ (विवाहित कन्याओं द्वारा मायके की याद में)
- हिमालयी महिलाओं की भावनाओं को स्वर देने वाले गीत
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 4: ‘जागर नृत्य‘ (Jagar) का मुख्य उद्देश्य और स्वरूप क्या है?
- यह एक अनुष्ठानिक नृत्य है जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है।
- इसमें ‘जगरिया’ ढोल-दमाऊ के माध्यम से देवताओं की गाथा गाता है।
- यह उत्तराखंड की आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 5: ‘हुड़किया बौल‘ (Hurkiya Baul) के बारे में क्या सत्य है?
- यह एक श्रम गीत है जो धान की रोपाई के समय गाया जाता है।
- इसमें गायक हुड़का बजाते हुए वीरों की गाथा गाता है।
- यह खेतों में काम करने वाले लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए गाया जाता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 6: उत्तराखंड के राजकीय वाद्ययंत्र ‘ढोल‘ के संबंध में कौन से कथन सही हैं?
- वर्ष 2015 में ढोल को उत्तराखंड का राजकीय वाद्ययंत्र घोषित किया गया।
- ‘ढोल सागर’ के ज्ञाता विभिन्न तालों के माध्यम से भावनाएं व्यक्त करते हैं।
- इसका उपयोग पूजा से लेकर सामाजिक उत्सवों तक सभी अवसरों पर होता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 7: जौनसार-बावर क्षेत्र के प्रमुख लोक नृत्य कौन से हैं?
- हारुल (जिसमें स्त्री-पुरुष सामूहिक भाग लेते हैं)
- बुड़ियात (जो मांगलिक अवसरों पर किया जाता है)
- पांडवों की परंपरा से जुड़े नृत्य
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 8: उत्तराखंड के लोक संगीत में ‘मांगल गीत‘ (Mangal Geet) का महत्व क्या है?
- ये विवाह, नामकरण और जनेऊ जैसे संस्कारों पर गाए जाते हैं।
- ये आशीर्वादात्मक गीत होते हैं जिनमें गणेश वंदना मुख्य होती है।
- इनमें देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 9: ‘सुषिर वाद्य‘ (फूँक मारकर बजाए जाने वाले) यंत्रों में उत्तराखंड में क्या प्रसिद्ध है?
- रणसिंघा (प्राचीन काल में युद्ध घोष के लिए प्रयुक्त)
- तुरही
- मशकबीन (Bagpipe), जो अब विवाहों का अनिवार्य हिस्सा है
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
प्रश्न 10: उत्तराखंड के लोक नृत्य और संगीत की अन्य महत्वपूर्ण विधाएँ कौन सी हैं?
- चांचरी या झोड़ा (गोलाकार घेरे में किया जाने वाला सामूहिक नृत्य)
- लंगवीर नृत्य (खंभे पर संतुलन बनाकर किया जाने वाला साहसिक नृत्य)
- थड़िया और चौंफुला (वसंत ऋतु और उल्लास के प्रतीक नृत्य)
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी