उत्तराखंड की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक खनन गतिविधियों के बीच संतुलन एक गंभीर चुनौती है।
- पारिस्थितिक संवेदनशीलता: उत्तराखंड एक ‘इको-सेंसिटिव’ राज्य है, जहाँ की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यंत कच्ची और अस्थिर है। यहाँ खनन गतिविधियों का थोड़ा सा भी असंतुलन बड़ी आपदाओं को जन्म दे सकता है।
- खनन नीति का दोहरा लक्ष्य: राज्य की खनन नीति (2001) का मुख्य उद्देश्य खनिज विकास के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण और खनन क्षेत्रों का वैज्ञानिक पुनर्वास सुनिश्चित करना है।
- वनों की क्षति: खनन पट्टों के आवंटन और पहुँच मार्ग बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होती है, जो राज्य के हरित आवरण (Green Cover) को सीधा नुकसान पहुँचाती है।
- जैव विविधता पर संकट: जंगलों के कटने से वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारे (Corridors) बाधित होते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है और दुर्लभ प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराता है।
- भूस्खलन का खतरा: पहाड़ी ढलानों पर खनन के लिए किए जाने वाले विस्फोट (Blasting) चट्टानों को कमजोर कर देते हैं। इससे मानसून के दौरान भूस्खलन की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है।
- मृदा अपरदन: वनस्पति आवरण हटने से उपजाऊ मिट्टी की पकड़ ढीली हो जाती है, जिससे भारी वर्षा में मिट्टी बहकर नदियों में जमा होने लगती है, जो बाढ़ का कारण बनती है।
- नदी तल खनन (RBM): नदियों के तल से रेत, बजरी और बोल्डर निकालने की प्रक्रिया यदि अनियंत्रित हो, तो यह नदियों के प्राकृतिक मार्ग को बदल देती है और पुलों की नींव को कमजोर करती है।
- जल प्रदूषण (Acid Mine Drainage): खनन क्षेत्रों से निकलने वाला रसायनयुक्त अपशिष्ट जल नदियों और भूमिगत जल स्रोतों को दूषित करता है, जो जलीय जीवन और मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है।
- वायु गुणवत्ता में गिरावट: ड्रिलिंग, क्रशिंग और खनिजों के परिवहन से उड़ने वाली धूल (Particulate Matter) स्थानीय निवासियों में सिलिकोसिस और दमा जैसी श्वसन संबंधी बीमारियाँ फैलाती है।
- ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव: भारी मशीनों और विस्फोटकों का शोर न केवल इंसानों की शांति भंग करता है, बल्कि संवेदनशील वन्यजीवों के प्रजनन और व्यवहार पैटर्न को भी बदल देता है।
- जल संसाधनों पर दबाव: खनिजों के प्रसंस्करण (Processing) में भारी मात्रा में पानी की खपत होती है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों के पारंपरिक जल स्रोतों (धारों-नौलों) पर नकारात्मक दबाव पड़ता है।
- भू-दृश्य परिवर्तन: अनियोजित खनन से सुंदर पहाड़ कुरूप गड्ढों और मलबे के ढेरों में तब्दील हो जाते हैं, जिससे राज्य की ‘पर्यटन छवि’ (Tourism Image) को स्थायी नुकसान पहुँचता है।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): बड़ी खनन परियोजनाओं के लिए EIA रिपोर्ट अनिवार्य है, ताकि कार्य शुरू करने से पहले संभावित खतरों और उनके निवारण के उपायों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके।
- सख्त कानूनी ढांचा: 1980 का वन संरक्षण अधिनियम राज्य में वन भूमि पर गैर-वानिकी कार्यों को कड़ाई से प्रतिबंधित करता है, जिसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति अनिवार्य है।
- डिजिटल निगरानी: अवैध खनन और रॉयल्टी चोरी रोकने के लिए सरकार ने ई-नीलामी और ई-रवन्ना जैसी पारदर्शी प्रणालियाँ लागू की हैं।
- पुनर्वास और पुनर्वनीकरण: खनन समाप्ति के बाद संबंधित एजेंसी को उस क्षेत्र का समतलीकरण और वृक्षारोपण करना अनिवार्य होता है, ताकि प्रकृति को पूर्व स्थिति में लाया जा सके।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खनन क्षेत्रों में जल और वायु मानकों की निगरानी करता है और नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने का प्रावधान रखता है।
- सतत खनन (Sustainable Mining): उत्तराखंड के लिए भविष्य का मार्ग ‘सतत खनन’ में निहित है, जहाँ आधुनिक तकनीक का उपयोग कर न्यूनतम पर्यावरणीय क्षति के साथ विदोहन किया जाए।
- जन भागीदारी: स्थानीय समुदायों को ‘वन पंचायतों’ के माध्यम से जागरूक करना और खनन के निर्णयों में उनकी राय शामिल करना सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में खनिज संपदा राजस्व का बड़ा स्रोत है, लेकिन इसका विदोहन ‘देवभूमि’ की पारिस्थितिक स्थिरता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सतत विकास ही एकमात्र विकल्प है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी
- उत्तराखंड की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और खनन के प्रभावों के बारे में क्या सत्य है?
- उत्तराखंड एक ‘इको-सेंसिटिव’ राज्य है जिसकी भूवैज्ञानिक संरचना अस्थिर है।
- यहाँ खनन में थोड़ा सा भी असंतुलन बड़ी प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे सकता है।
- खनन पट्टों और मार्गों के लिए होने वाली वनों की कटाई हरित आवरण को नुकसान पहुँचाती है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- खनन गतिविधियों के कारण जैव-विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?
- जंगलों के कटने से वन्यजीवों के प्राकृतिक गलियारे (Corridors) बाधित होते हैं।
- गलियारों के बाधित होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि होती है।
- दुर्लभ प्रजातियों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- पहाड़ी ढलानों पर होने वाले खनन से उत्पन्न भूवैज्ञानिक खतरों के बारे में क्या सत्य है?
- खनन के लिए किए जाने वाले विस्फोट (Blasting) चट्टानों को कमजोर कर देते हैं।
- चट्टानों के कमजोर होने से मानसून के दौरान भूस्खलन की आवृत्ति बढ़ जाती है।
- वनस्पति हटने से मृदा अपरदन बढ़ता है, जो नदियों में सिल्ट जमा कर बाढ़ का कारण बनता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- नदी तल खनन (RBM – River Bed Mining) के अनियंत्रित होने के क्या दुष्प्रभाव हो सकते हैं?
- यह नदियों के प्राकृतिक मार्ग को बदल सकता है।
- इससे पुलों और अन्य बुनियादी ढाँचों की नींव कमजोर हो सकती है।
- यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- खनन से होने वाले जल और वायु प्रदूषण के संबंध में कौन सा तथ्य सही है?
- अपशिष्ट जल (Acid Mine Drainage) भूमिगत और सतही जल स्रोतों को दूषित करता है।
- धूल के कणों (Particulate Matter) से सिलिकोसिस और दमा जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।
- खनिजों के प्रसंस्करण में भारी जल खपत से पारंपरिक स्रोतों (धारों-नौलों) पर दबाव पड़ता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- खनन गतिविधियों का स्थानीय निवासियों और वन्यजीवों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- भारी मशीनों का शोर वन्यजीवों के प्रजनन और व्यवहार पैटर्न को बदल देता है।
- अनियोजित खनन से पहाड़ों का भू-दृश्य बिगड़ता है, जिससे पर्यटन छवि को नुकसान होता है।
- धूल और ध्वनि प्रदूषण स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य और शांति को प्रभावित करते हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA. और कानूनी ढांचे के बारे में क्या सत्य है?
- बड़ी परियोजनाओं के लिए EIA रिपोर्ट अनिवार्य है ताकि खतरों का वैज्ञानिक अध्ययन हो सके।
- 1980 का वन संरक्षण अधिनियम वन भूमि पर गैर-वानिकी कार्यों को प्रतिबंधित करता है।
- वन भूमि पर खनन के लिए केंद्र सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- अवैध खनन रोकने और पारदर्शिता के लिए सरकार ने कौन सी डिजिटल पहल की है?
- खनिजों के आवंटन के लिए ई-नीलामी प्रणाली लागू की गई है।
- रॉयल्टी और परिवहन की निगरानी के लिए ई-रवन्ना प्रणाली अपनाई गई है।
- इन प्रणालियों का उद्देश्य अवैध खनन और राजस्व की चोरी को रोकना है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- खनन के बाद सुधार और पुनर्वास (Reclamation) के लिए क्या नियम हैं?
- खनन समाप्ति के बाद संबंधित एजेंसी को उस क्षेत्र का समतलीकरण करना अनिवार्य है।
- प्रभावित क्षेत्र में पुनर्वनीकरण (Plantation) करना आवश्यक है।
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन मानकों की निगरानी और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान रखता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- उत्तराखंड में खनन के भविष्य और ‘सतत खनन‘ (Sustainable Mining) के बारे में क्या सही है?
- आधुनिक तकनीक का उपयोग कर न्यूनतम पर्यावरणीय क्षति के साथ विदोहन करना।
- स्थानीय समुदायों और वन पंचायतों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना।
- पारिस्थितिक स्थिरता और राजस्व प्राप्ति के बीच एक उचित संतुलन बनाना।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी