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भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधान

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान निर्माताओं ने यह समझा था कि देश के विशाल आकार, विविधताओं और संभावित चुनौतियों को देखते हुए असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रावधान आवश्यक होंगे। इसीलिए संविधान में आपातकालीन प्रावधानों (Emergency Provisions) की व्यवस्था की गई है। इनका उद्देश्य यह है कि संकट के समय केंद्र सरकार के हाथ में पर्याप्त शक्तियाँ हों, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता को बनाए रखा जा सके। हालांकि, ये प्रावधान संघीय ढाँचे को अस्थायी रूप से एकात्मक स्वरूप में बदल देते हैं।

  1. राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency – अनुच्छेद 352)
  • यह आपातकाल तीन परिस्थितियों में लगाया जा सकता है—युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह।
  • इसकी घोषणा राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन केवल मंत्रिपरिषद की लिखित सलाह पर।
  • प्रभाव:
    • केंद्र को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है।
    • संसद का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है।
    • मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 19) का निलंबन हो सकता है।
  • 1975-77 की राष्ट्रीय आपातकाल सबसे विवादास्पद उदाहरण है, जब राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इसका दुरुपयोग हुआ।
  1. राज्य आपातकाल (President’s Rule – अनुच्छेद 356)
  • यदि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार कार्य करने में अक्षम हो जाए, तो राष्ट्रपति, राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य स्रोतों के आधार पर राष्ट्रपति शासन घोषित कर सकते हैं।
  • प्रभाव:
    • राज्य विधानसभा निलंबित या भंग हो जाती है।
    • राज्य के प्रशासनिक अधिकार राष्ट्रपति के अधीन आ जाते हैं, जिन्हें राज्यपाल के माध्यम से प्रयोग किया जाता है।
  • इसका अक्सर राजनीतिक कारणों से दुरुपयोग किया गया है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई केस (1994) में सीमाएँ लगाई और न्यायिक समीक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया।
  1. वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency – अनुच्छेद 360)
  • यदि भारत की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा हो, तो राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं।
  • प्रभाव:
    • केंद्र राज्य के बजट और वित्तीय मामलों में नियंत्रण कर सकता है।
    • सभी सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती की जा सकती है।
  • अब तक भारत में कभी भी वित्तीय आपातकाल लागू नहीं किया गया है।
  1. आपातकालीन प्रावधानों की विशेषताएँ और सुरक्षा
  • आपातकाल की घोषणा संसद की स्वीकृति के बिना स्थाई रूप से लागू नहीं रह सकती। इसे हर छह महीने पर अनुमोदित करना आवश्यक होता है।
  • 44वें संशोधन (1978) के बाद न्यायिक समीक्षा का प्रावधान जोड़ा गया, जिससे आपातकाल की घोषणा की वैधता अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
  • इसका उद्देश्य दुरुपयोग की संभावना को सीमित करना है।

निष्कर्ष:

भारतीय संविधान के आपातकालीन प्रावधान असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक साधन प्रदान करते हैं। लेकिन इनका प्रभाव संघीय ढाँचे को एकात्मक बना देता है और मौलिक अधिकारों पर भी अंकुश लगता है। 1975 की आपातकाल की घटना ने यह स्पष्ट किया कि इन शक्तियों का दुरुपयोग भी संभव है। इसलिए संसद की स्वीकृति और न्यायिक समीक्षा जैसे सुरक्षा उपाय लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इस प्रकार आपातकालीन प्रावधान भारत की सुरक्षा का कवच तो हैं, किंतु इनके प्रयोग में सर्वोच्च सतर्कता और संवैधानिक मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) किस स्थिति में लगाया जा सकता है?
(a) प्राकृतिक आपदा, महँगाई और भ्रष्टाचार
(b) युद्ध, बाहरी आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह
(c) वित्तीय संकट और बेरोजगारी
(d) राज्य सरकार का असफल होना

उत्तर: (b) युद्ध, बाहरी आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह
व्याख्या: राष्ट्रीय आपातकाल अनुच्छेद 352 के तहत तीन परिस्थितियों में लगाया जाता है—युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक सशस्त्र विद्रोह। इसकी घोषणा राष्ट्रपति करते हैं लेकिन मंत्रिपरिषद की लिखित सलाह पर। इसके दौरान केंद्र को राज्यों पर व्यापक नियंत्रण मिल जाता है और नागरिकों के मौलिक अधिकार, विशेषकर अनुच्छेद 19, निलंबित हो सकते हैं।

प्रश्न 2: राज्य आपातकाल (अनुच्छेद 356) किस आधार पर लगाया जाता है?
(a) जब वित्तीय संकट हो
(b) जब सशस्त्र विद्रोह हो
(c) जब राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य न कर पाए
(d) जब संसद में बहुमत न हो

उत्तर: (c) जब राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य न कर पाए
व्याख्या: अनुच्छेद 356 के तहत यदि किसी राज्य की सरकार संविधान के अनुसार कार्य करने में अक्षम होती है तो राष्ट्रपति, राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य स्रोतों के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू कर सकते हैं। इसमें विधानसभा भंग हो जाती है और राज्य प्रशासन राष्ट्रपति के अधीन चला जाता है। एस.आर. बोम्मई केस (1994) में इस दुरुपयोग को सीमित किया गया।

प्रश्न 3: भारत में अब तक कौन-सा आपातकाल कभी लागू नहीं हुआ है?
(a) राष्ट्रीय आपातकाल
(b) राज्य आपातकाल
(c) वित्तीय आपातकाल
(d) सभी लागू हुए हैं

उत्तर: (c) वित्तीय आपातकाल
व्याख्या: अनुच्छेद 360 के तहत राष्ट्रपति तब वित्तीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं जब भारत की वित्तीय स्थिरता को खतरा हो। ऐसे में केंद्र राज्यों के वित्तीय मामलों पर नियंत्रण कर सकता है और कर्मचारियों के वेतन तक घटा सकता है। हालांकि, स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक वित्तीय आपातकाल कभी लागू नहीं किया गया, जबकि अन्य दो प्रकार के आपातकाल लागू हो चुके हैं।

प्रश्न 4: आपातकाल की घोषणा को संसद की स्वीकृति कितने समय पर अनिवार्य रूप से लेनी होती है?
(a) हर तीन महीने पर
(b) हर छह महीने पर
(c) हर साल
(d) स्थायी रूप से बिना सीमा

उत्तर: (b) हर छह महीने पर
व्याख्या: आपातकाल की घोषणा संसद की स्वीकृति के बिना लंबे समय तक लागू नहीं रह सकती। इसे हर छह महीने पर संसद से अनुमोदित कराना आवश्यक होता है। यह व्यवस्था जांच और संतुलन बनाए रखने के लिए की गई है, ताकि कार्यपालिका की असाधारण शक्तियाँ लोकतंत्र पर स्थायी असर न डाल सकें और दुरुपयोग की संभावना सीमित हो सके।

प्रश्न 5: 44वें संशोधन (1978) के तहत आपातकाल से संबंधित कौन-सी सुरक्षा जोड़ी गई?
(a) न्यायपालिका को खत्म करना
(b) मौलिक अधिकारों को स्थायी रूप से निलंबित करना
(c) न्यायिक समीक्षा का प्रावधान
(d) राष्ट्रपति को असीमित अधिकार देना

उत्तर: (c) न्यायिक समीक्षा का प्रावधान
व्याख्या: 44वें संशोधन (1978) में आपातकाल से संबंधित महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय किए गए। इस संशोधन ने यह सुनिश्चित किया कि आपातकाल की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन होगी और अदालत इसमें हस्तक्षेप कर सकती है। इसका उद्देश्य था कि 1975-77 जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो और लोकतंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की जा सके।

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