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भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान को यदि जीवंत दस्तावेज कहा जाता है तो इसका कारण उसकी संशोधन प्रक्रिया है। संविधान निर्माताओं ने इसे न तो अत्यधिक कठोर बनाया और न ही बहुत लचीला। इसका उद्देश्य यह था कि बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप इसमें सुधार किए जा सकें लेकिन संविधान की मूल संरचना और स्थायित्व भी बना रहे। अनुच्छेद 368 में इस प्रक्रिया का प्रावधान है।

संविधान संशोधन की प्रक्रियाएँ

  1. साधारण बहुमत से संशोधन (Simple Majority)
    यह संशोधन संसद के साधारण कानून निर्माण की तरह होता है। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत पर्याप्त होता है।
    • उदाहरण: नए राज्यों का निर्माण (जैसे तेलंगाना), राज्य विधानसभाओं के सदस्यों की संख्या में परिवर्तन, नागरिकता संबंधी नियमों में बदलाव।
  2. विशेष बहुमत से संशोधन (Special Majority)
    इसमें दो शर्तें पूरी करना आवश्यक है–
    • संसद के कुल सदस्यों का बहुमत
    • उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।
      इसका उपयोग संविधान के अधिकांश प्रावधानों, जैसे मौलिक अधिकार, केंद्र-राज्य संबंधों के मुद्दे आदि में किया जाता है।
    • उदाहरण: 42वाँ संविधान संशोधन (1976) जिसमें व्यापक बदलाव किए गए और 44वाँ संशोधन (1978) जिसने आपातकालीन प्रावधानों को संतुलित किया।
  3. विशेष बहुमत + राज्यों की आधी विधानसभाओं की पुष्टि (Ratification by half states)
    कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों के संशोधन के लिए संसद में विशेष बहुमत प्राप्त करने के बाद कम-से-कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति भी आवश्यक होती है।
    • उदाहरण: 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992) पंचायतों एवं नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देना,
    • 101वाँ संशोधन (2016) वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू करना।

भारतीय संशोधन प्रक्रिया की विशेषताएँ

  1. लचीली और कठोर दोनों
    कुछ प्रावधान साधारण बहुमत से बदल सकते हैं, जबकि कुछ के लिए विशेष बहुमत और राज्यीय पुष्टि आवश्यक है। इस प्रकार यह ना पूरी तरह कठोर है, ना पूरी तरह लचीला।
  2. स्थायित्व और प्रगतिशीलता का संतुलन
    यह संशोधन प्रक्रिया संविधान को स्थिर भी रखती है और बदलती परिस्थितियों के अनुसार नए प्रावधान जोड़ने की क्षमता भी देती है।
  3. न्यायिक समीक्षा की सीमा
    केशवानंद भारती मामले (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसद संविधान संशोधन करते समय मूल संरचना (Basic Structure) को नहीं बदल सकती।

निष्कर्ष:

भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया संतुलित है, जो इसे विश्व का एक अद्वितीय संविधान बनाती है। साधारण, विशेष और विशेष बहुमत + राज्यों की पुष्टि—इन तीन स्तरों के माध्यम से संविधान में अब तक 100 से अधिक बार संशोधन किए जा चुके हैं। 42वें संशोधन ने इसकी व्यापकता को, 44वें संशोधन ने इसकी लोकतांत्रिक आत्मा को और 101वें संशोधन ने इसकी आर्थिक प्रासंगिकता को नया रूप दिया। इस प्रकार संशोधन प्रक्रिया संविधान को जीवंत और समय के अनुरूप ढालने का सशक्त माध्यम है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1: भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया किस अनुच्छेद में दी गई है?
A) अनुच्छेद 356
B) अनुच्छेद 370
C) अनुच्छेद 368
D) अनुच्छेद 21

सही उत्तर: C) अनुच्छेद 368

स्पष्टीकरण:
संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में वर्णित है। इसे इस प्रकार बनाया गया है कि संविधान बहुत कठोर भी न रहे और बहुत लचीला भी न। संविधान संशोधनों का उद्देश्य बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था करना है, जबकि संविधान की मूल संरचना को स्थिर बनाए रखना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी मूल ढाँचे पर संसद की शक्ति सीमित की है।

प्रश्न 2: भारत में “साधारण बहुमत” से किए गए संशोधनों का उदाहरण कौन-सा है?
A) 42वाँ संशोधन, 1976
B) 44वाँ संशोधन, 1978
C) तेलंगाना राज्य का गठन
D) 73वाँ संशोधन, 1992

सही उत्तर: C) तेलंगाना राज्य का गठन

स्पष्टीकरण:
भारत में साधारण बहुमत से किए गए संशोधन संसद के सामान्य कानून निर्माण की तरह होते हैं। इनमें उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत पर्याप्त होता है। तेलंगाना राज्य का निर्माण, राज्य विधानसभाओं की सीटों में बदलाव, तथा नागरिकता संबंधी नियमों का संशोधन इसी श्रेणी में आते हैं। यह दर्शाता है कि कुछ प्रावधानों को बदलना अपेक्षाकृत सरल है।

प्रश्न 3: भारत सरकार संविधान के अधिकांश प्रावधान जैसे मौलिक अधिकार या केंद्र-राज्य संबंध का संशोधन किस प्रकार करती है?
A) साधारण बहुमत से
B) विशेष बहुमत से
C) केवल राज्यों की सहमति से
D) न्यायिक स्वीकृति से

सही उत्तर: B) विशेष बहुमत से

स्पष्टीकरण:
अधिकांश संवैधानिक प्रावधान, जिनमें मौलिक अधिकार, केंद्र-राज्य संबंध, और अन्य महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं, विशेष बहुमत से संशोधित होते हैं। विशेष बहुमत का अर्थ है—संसद के कुल सदस्यों का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। उदाहरण के लिए 42वाँ संशोधन (1976) और 44वाँ संशोधन (1978) विशेष बहुमत से पारित किए गए थे।

प्रश्न 4: संविधान के कुछ प्रावधानों को संशोधित करने के लिए विशेष बहुमत के साथ किनकी स्वीकृति आवश्यक होती है?
A) राष्ट्रपति
B) सर्वोच्च न्यायालय
C) आधे राज्यों की विधानसभाएँ
D) राज्यपाल

सही उत्तर: C) आधे राज्यों की विधानसभाएँ

स्पष्टीकरण:
कुछ प्रावधान इतने संवेदनशील हैं कि उन्हें बदलने के लिए केवल विशेष बहुमत ही नहीं, बल्कि कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति भी आवश्यक है। उदाहरण स्वरूप 73वाँ और 74वाँ संशोधन (1992) जिससे पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया, तथा 101वाँ संशोधन (2016) जिसके तहत जीएसटी लागू हुआ। इससे संघीय ढाँचे का संतुलन बना रहता है।

प्रश्न 5: केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या निर्णय दिया?
A) संसद संविधान पूरी तरह बदल सकती है
B) सुप्रीम कोर्ट संशोधित संविधान को रद्द कर सकता है
C) संसद संविधान की मूल संरचना नहीं बदल सकती
D) संशोधन प्रक्रिया अदालत के नियंत्रण से बाहर है

सही उत्तर: C) संसद संविधान की मूल संरचना नहीं बदल सकती

स्पष्टीकरण:
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत दिया कि संसद के पास संविधान संशोधन की शक्ति है, लेकिन वह संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नहीं बदल सकती। मूल संरचना में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संघवाद शामिल हैं। इस निर्णय ने भारतीय संविधान की स्थिरता और लोकतांत्रिक आत्मा को सुरक्षित किया।

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