प्रस्तावना:
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) एक मील का पत्थर माना जाता है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में यह आंदोलन 1930 से 1934 तक चला। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों का उल्लंघन कर प्रतिरोध करना था। गांधीजी द्वारा नमक सत्याग्रह के साथ प्रारंभ किए गए इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जनांदोलन का व्यापक स्वरूप दिया।
आंदोलन की शुरुआत
- नमक कानून का उल्लंघन – 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा प्रारंभ की और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक बनाकर ब्रिटिश कानून की अवज्ञा की।
- यह कार्य भारतीय जनता के लिए प्रतिरोध का प्रतीक बन गया और पूरे देश में कानून उल्लंघन की लहर फैल गई।
आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
- नमक कर का विरोध और नमक बनाना।
- सरकारी शराबखानों, विदेशी वस्त्रों, कर कार्यालयों और परगना कार्यालयों का बहिष्कार।
- जंगल कानूनों और राजस्व नीतियों के खिलाफ ग्रामीणों का प्रतिरोध।
- विदेशी वस्त्रों की होली जलाना और स्वदेशी को प्रोत्साहन।
जनसामान्य की भागीदारी
- ग्रामीण समाज – किसानों ने लगान न चुका कर और जंगल कानूनों का उल्लंघन कर आंदोलन में भाग लिया।
- महिलाएँ – इस आंदोलन में महिलाएँ पहली बार बड़े पैमाने पर जुलूसों और सत्याग्रह में सम्मिलित हुईं।
- युवा और विद्यार्थी – विद्यालयों और कॉलेजों से छात्रों का बहिष्कार और प्रतिरोध।
- श्रमिक वर्ग – हड़तालों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध।
ब्रिटिश प्रतिक्रिया और दमन
- आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने हजारों लोगों को जेल में डाला, जिनमें स्वयं गांधीजी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता भी शामिल थे।
- कठोर दमन के बावजूद आंदोलन चलता रहा और अंग्रेज शासन की कठिनाइयाँ बढ़ीं।
राजनीतिक परिणाम
- गोलमेज सम्मेलन – ब्रिटिश सरकार को भारतीय नेताओं से संवाद हेतु लंदन में गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन करना पड़ा।
- पूर्ण स्वराज का विचार – आंदोलन ने स्पष्ट कर दिया कि अब भारतीय केवल सुधारों से संतुष्ट नहीं होंगे, बल्कि उनका वास्तविक लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता है।
- कांग्रेस की भूमिका – इस आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जनता की वास्तविक प्रतिनिधि संस्था के रूप में स्थापित कर दिया।
निष्कर्ष:
सविनय अवज्ञा आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। इसमें महिलाएँ, किसान, मजदूर और मध्यमवर्ग सभी सक्रिय हुए, जिससे यह वास्तव में भारतीय जनता का राष्ट्रीय आंदोलन बन गया। यद्यपि ब्रिटिश दमन ने इसे अस्थायी रूप से पीछे धकेल दिया, लेकिन इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की माँग को जनसामान्य का लक्ष्य बना दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को राष्ट्रीय आकांक्षाओं का प्रवक्ता सिद्ध किया। इस प्रकार सविनय अवज्ञा आंदोलन भारत की स्वतंत्रता यात्रा का एक निर्णायक चरण सिद्ध हुआ।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQS) और उत्तर
प्रश्न 1. सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत किस घटना से हुई थी?
(a) खिलाफत आंदोलन से
(b) नमक सत्याग्रह से
(c) असहयोग आंदोलन से
(d) चंपारण सत्याग्रह से
उत्तर: (b) नमक सत्याग्रह से
व्याख्या: गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा द्वारा की, जो 6 अप्रैल को समुद्र तट तक पहुँची। वहाँ उन्होंने ब्रिटिश कानून का उल्लंघन करते हुए नमक बनाया। यह प्रतीकात्मक कार्रवाई पूरे भारत में उपनिवेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बनी और आंदोलन ने राष्ट्रीय चरित्र ग्रहण किया।
प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
(a) आंशिक सुधारों की माँग
(b) ब्रिटिश करों में कमी
(c) अन्यायपूर्ण कानूनों का खुला उल्लंघन
(d) ब्रिटिश शासन के साथ समझौता
उत्तर: (c) अन्यायपूर्ण कानूनों का खुला उल्लंघन
व्याख्या: गांधीजी का लक्ष्य केवल याचना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों को अस्वीकार करना था। नमक कानून, वन कानून, कर नीति और विदेशी वस्त्रों के विरोध जैसे कार्यक्रमों ने आंदोलन को जनाधारित रूप दिया। यह आंदोलन ब्रिटिश दमन के विरुद्ध नागरिक प्रतिरोध और आत्मबल का प्रतीक बन गया, जिससे अंग्रेज सरकार चिंतित हुई।
प्रश्न 3. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका के संबंध में सही कथन कौन-सा है?
(a) महिलाओं ने भाग नहीं लिया
(b) सीमित नेतृत्व भूमिका निभाई
(c) बड़े पैमाने पर जुलूसों और सत्याग्रह में भाग लिया
(d) विद्यालयों में असहयोग किया
उत्तर: (c) बड़े पैमाने पर जुलूसों और सत्याग्रह में भाग लिया
व्याख्या: सविनय अवज्ञा आंदोलन पहली बार था जब भारतीय महिलाएँ व्यापक रूप से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने जुलूसों, धरनों और नमक बनने की प्रत्यक्ष गतिविधियों में भाग लिया। सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने नेतृत्व संभाला। महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को सामाजिक-सांस्कृतिक गहराई और नैतिक बल प्रदान किया।
प्रश्न 4. सविनय अवज्ञा आंदोलन के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को क्या कदम उठाना पड़ा?
(a) भारतीय सेवाओं में सुधार
(b) कांग्रेस पर प्रतिबंध
(c) गोलमेज सम्मेलन का आयोजन
(d) भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान
उत्तर: (c) गोलमेज सम्मेलन का आयोजन
व्याख्या: सविनय अवज्ञा आंदोलन के व्यापक प्रभाव ने ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाया। भारत में बढ़ते जनविरोध और कांग्रेस के नेतृत्व को समझते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1930 से 1932 के बीच लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया। इसका उद्देश्य भारतीय नेताओं से संवाद द्वारा शांति स्थापित करना था। यह आंदोलन की सफलता का संकेत था।
प्रश्न 5. सविनय अवज्ञा आंदोलन का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर क्या प्रभाव पड़ा?
(a) कांग्रेस कमजोर हुई
(b) कांग्रेस विभाजित हो गई
(c) कांग्रेस जनता की सच्ची प्रतिनिधि संस्था बन गई
(d) कांग्रेस ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया
उत्तर: (c) कांग्रेस जनता की सच्ची प्रतिनिधि संस्था बन गई
व्याख्या: सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने किसानों, महिलाओं, मजदूरों और मध्यवर्गीय नागरिकों को संगठित किया। इसके कारण कांग्रेस जनमानस से सीधी जुड़ाव वाली संस्था बन गई। ब्रिटिश नीतियों से असंतुष्ट जनता ने कांग्रेस को ही नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया। इसने उसे स्वतंत्रता संघर्ष का वास्तविक प्रतिनिधि संगठन बना दिया।