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पेशावर कांड और गढ़वाली सैनिकों का योगदान

प्रस्तावना:

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 अप्रैल 1930 को हुई ‘पेशावर कांड’ की घटना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह घटना केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सैनिकों के भीतर देशभक्ति की भावना और उनके मानवीय मूल्यों का भी प्रमाण थी। इस ऐतिहासिक घटना के केंद्र में गढ़वाल राइफल्स के सैनिक थे, जिन्होंने अपने ब्रिटिश कमांडरों के निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया। उनका यह साहस उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय बन गया।

निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश: 1930 में, महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरे देश में फैल गया था। इसी दौरान, पेशावर में खुदाई खिदमतगार और कांग्रेस के निहत्थे प्रदर्शनकारी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे। आंदोलन को कुचलने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने गढ़वाल राइफल्स की एक टुकड़ी को भेजा, जिसे भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया गया।

चन्द्र सिंह गढ़वाली का नेतृत्व: जब गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश मिला, तो हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा, “हम अपने निहत्थे देशवासियों पर गोली नहीं चलाएँगे।” उनकी इस साहसी अवहेलना ने ब्रिटिश सरकार को स्तब्ध कर दिया। यह पहली बार था जब ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर इस तरह का संगठित विद्रोह हुआ था।

भारतीय सैनिकों की देशभक्ति: पेशावर कांड ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक भी अपने देश के प्रति वफादार थे और वे केवल ब्रिटिश सरकार के आदेशों का पालन करने के लिए नहीं थे। चंद्र सिंह गढ़वाली का यह निर्णय न केवल एक सैनिक का विद्रोह था, बल्कि यह भारतीय सैनिकों में राष्ट्रवाद की बढ़ती भावना का भी प्रतीक था। इस घटना ने पूरे देश में लोगों को यह विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सेना के भीतर भी देशभक्ति की लहर फैल रही है।

कठोर दंड और वीरता का प्रतीक: इस विद्रोह के कारण, ब्रिटिश सरकार ने चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों को कोर्ट-मार्शल किया। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और जेल में कठोर यातनाएँ दी गईं। हालाँकि, इस दंड ने उन्हें दबाने के बजाय, उन्हें एक महान स्वतंत्रता सेनानी और वीरता के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया। ‘गढ़वाली’ नाम उनके साहस और देशभक्ति का पर्याय बन गया।

राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा: पेशावर कांड ने पूरे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई ऊर्जा और दिशा दी। यह घटना राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से छपी और इसने लोगों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आक्रोश को और बढ़ा दिया। इस घटना ने यह संदेश दिया कि जब सैनिक भी उनका साथ नहीं दे रहे हैं, तो ब्रिटिश राज का अंत अब निकट है। यह उत्तराखंड के सैनिकों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर था।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, पेशावर कांड में चंद्र सिंह गढ़वाली और गढ़वाली सैनिकों का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक गौरवशाली अध्याय है। उनके साहस और मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने न केवल ब्रिटिश सैन्य शक्ति को चुनौती दी, बल्कि पूरे भारत में स्वतंत्रता की लड़ाई को एक नई गति दी। यह घटना उत्तराखंड के लिए गर्व का विषय है और हमें हमेशा यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता बिना साहस और बलिदान के हासिल नहीं की जा सकती।

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