परिचय
हिमालय, अपनी भूगर्भीय अस्थिरता, खड़ी ढलानों, और जटिल जलवायु पैटर्न के कारण, दुनिया के सबसे आपदा-प्रवण क्षेत्रों में से एक है। भूस्खलन, आकस्मिक बाढ़, भूकंप, बादल फटना, हिमस्खलन और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाएँ हिमालयी राज्यों में नियमित रूप से घटित होती हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है, बुनियादी ढाँचा नष्ट होता है और स्थानीय समुदायों की आजीविका प्रभावित होती है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, हिमालयी राज्यों ने भारत सरकार के ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005’ के अनुरूप अपनी आपदा प्रबंधन नीतियां और संस्थागत ढाँचे विकसित किए हैं। इन नीतियों और ढाँचों का उद्देश्य आपदाओं के जोखिम को कम करना, तैयारी बढ़ाना, प्रभावी प्रतिक्रिया देना और आपदा के बाद पुनर्वास व पुनर्निर्माण सुनिश्चित करना है।
हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन नीतियां और संस्थागत ढाँचा:
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का प्रभाव: भारत सरकार द्वारा पारित आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने देश में आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया। इसने प्रतिक्रिया-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर जोखिम न्यूनीकरण, तैयारी और शमन पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। हिमालयी राज्यों ने इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपने स्वयं के राज्य-विशिष्ट आपदा प्रबंधन अधिनियम और नीतियां विकसित की हैं, जो उन्हें आपदा प्रबंधन के लिए एक कानूनी और संस्थागत ढाँचा प्रदान करते हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA): राष्ट्रीय स्तर पर, NDMA आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश निर्धारित करता है। राज्य स्तर पर, प्रत्येक हिमालयी राज्य में एक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) होता है, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं। SDMA राज्य आपदा प्रबंधन नीति और योजना तैयार करने, शमन उपायों की सिफारिश करने, और राज्य में आपदा प्रबंधन गतिविधियों की निगरानी और समन्वय के लिए जिम्मेदार है।
जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA): SDMA के नीचे, प्रत्येक जिले में एक जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) होता है, जिसकी अध्यक्षता जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर करते हैं। DDMA जिले के भीतर आपदा प्रबंधन के लिए योजनाएँ तैयार करने और उन्हें लागू करने, सामुदायिक प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों की सुविधा प्रदान करने, और आपदा के समय राहत एवं बचाव कार्यों का समन्वय करने के लिए जिम्मेदार है। यह जमीनी स्तर पर आपदा प्रबंधन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है।
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF): आपदा प्रतिक्रिया के लिए, हिमालयी राज्यों के पास अपने राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) होते हैं, जो विशेष रूप से आपदाओं से निपटने के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित होते हैं। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) की बटालियनें भी आवश्यकता पड़ने पर सहायता प्रदान करती हैं। ये बल खोज और बचाव अभियान, चिकित्सा सहायता और राहत सामग्री वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जोखिम मूल्यांकन और संवेदनशीलता मानचित्रण: हिमालयी राज्यों की आपदा प्रबंधन नीतियों में जोखिम मूल्यांकन और संवेदनशीलता मानचित्रण पर जोर दिया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार के खतरों (जैसे भूकंपीय क्षेत्र, भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र, बाढ़ के मैदान) की पहचान करना और उन क्षेत्रों में आबादी और बुनियादी ढाँचे की संवेदनशीलता का आकलन करना शामिल है। यह जानकारी विकास योजनाओं और शमन उपायों को सूचित करने में मदद करती है।
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Systems – EWS): हिमालयी राज्यों ने विभिन्न आपदाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया है। इसमें मौसम राडार, नदी के जल स्तर सेंसर, भूकंपीय निगरानी नेटवर्क और उपग्रह प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है। चेतावनी संदेशों को समय पर और प्रभावी ढंग से समुदायों तक पहुँचाने के लिए संचार नेटवर्क (जैसे SMS अलर्ट, सार्वजनिक घोषणाएँ) विकसित किए जा रहे हैं।
क्षमता निर्माण और सामुदायिक भागीदारी: आपदा प्रबंधन नीतियों में सभी स्तरों पर क्षमता निर्माण पर जोर दिया जाता है, जिसमें सरकारी अधिकारी, स्वयंसेवक और स्थानीय समुदाय शामिल हैं। समुदायों को आपदा जोखिमों के बारे में शिक्षित किया जाता है, और उन्हें प्रारंभिक प्रतिक्रिया, खोज और बचाव, और प्राथमिक उपचार के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। स्वदेशी ज्ञान और पारंपरिक प्रथाओं को भी आपदा जोखिम न्यूनीकरण में एकीकृत किया जा रहा है।
आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा और निर्माण कोड: नीतियों में आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे के निर्माण और सख्त निर्माण कोड को लागू करने पर जोर दिया जाता है। इसमें भूकंप-रोधी भवन डिजाइन, भूस्खलन-स्थिरता उपाय, और बाढ़-सुरक्षित संरचनाएँ शामिल हैं। अनियोजित शहरीकरण और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण को नियंत्रित करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।
पुनर्वास, पुनर्निर्माण और लचीलापन: आपदा के बाद, नीतियों में प्रभावित समुदायों के पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए प्रावधान शामिल हैं। इसमें आवास, आजीविका की बहाली, और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना शामिल है। दीर्घकालिक लचीलापन बनाने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाता है, ताकि समुदाय भविष्य की आपदाओं का सामना करने और उनसे उबरने में अधिक सक्षम हों।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता: हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन नीतियों और ढाँचों के बावजूद, कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इनमें दुर्गम इलाके, सीमित वित्तीय संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञता की कमी, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय का अभाव, और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव शामिल हैं। भविष्य के मार्ग में इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए सतत निवेश, अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, अनुसंधान और विकास, और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को और मजबूत करना शामिल है।
निष्कर्ष
हिमालयी राज्यों में आपदा प्रबंधन नीतियां और संस्थागत ढाँचे इस क्षेत्र की अद्वितीय और जटिल आपदा संवेदनशीलता को संबोधित करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 द्वारा निर्देशित, इन राज्यों ने जोखिम न्यूनीकरण, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्वास पर केंद्रित एक बहु-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाया है। हालाँकि इन ढाँचों ने आपदाओं के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन हिमालय की बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के आलोक में निरंतर सुधार और अनुकूलन की आवश्यकता है। एक मजबूत, लचीला और समुदाय-केंद्रित आपदा प्रबंधन प्रणाली का निर्माण हिमालयी राज्यों के सतत विकास और उनके निवासियों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।