प्रस्तावना:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई केवल भारत के बड़े शहरों और मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसकी लहर हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में बसे उत्तराखंड के कुमाऊँ तक भी पहुँची। इस क्षेत्र ने अपनी भौगोलिक बाधाओं के बावजूद, ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मजबूत और संगठित प्रतिरोध खड़ा किया। कुमाऊँ के नेताओं, बुद्धिजीवियों और आम जनता ने मिलकर इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी: 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान, कुमाऊँ क्षेत्र में बद्रीदत्त पांडे और गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेताओं ने लोगों को संगठित किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए जन-जागरण अभियान चलाए। लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया, सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों को छोड़ दिया और गांधीजी के आह्वान पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया। इस आंदोलन ने कुमाऊँ के लोगों को पहली बार बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
कुली बेगार प्रथा का सफल विरोध: कुमाऊँ में ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी शोषणकारी नीति ‘कुली बेगार’ थी, जिसमें ग्रामीणों को बिना वेतन के ब्रिटिश अधिकारियों के लिए सामान ढोना पड़ता था। 1921 में, बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में, हजारों लोगों ने बागेश्वर में उत्तरैनी मेले के दौरान इस प्रथा का बहिष्कार किया। उन्होंने कुली रजिस्टर को सरयू नदी में बहा दिया, जिससे इस प्रथा का अंत हुआ। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने पूरे देश में लोगों को प्रेरित किया और उत्तराखंड में अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति को साबित किया।
बौद्धिक जागरण का केंद्र: कुमाऊँ ने कई प्रमुख नेताओं, लेखकों और समाज सुधारकों को जन्म दिया जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से राष्ट्रीय विचारों को फैलाया। ‘अल्मोड़ा अखबार’ जैसे समाचार पत्रों ने ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की और स्वतंत्रता, सामाजिक सुधारों और राष्ट्रीय एकता के विषय में लेख प्रकाशित किए। इसने कुमाऊँ के लोगों को शिक्षित किया और उन्हें यह महसूस कराया कि वे भी एक बड़े राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा हैं।
युवाओं की सक्रिय भागीदारी: कुमाऊँ के युवाओं ने भी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्टर मोहन जोशी जैसे युवा नेताओं ने लोगों को संगठित किया और उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। इस क्षेत्र के कई युवा बाद में सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) में भी शामिल हुए, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी देशभक्ति ने पूरे क्षेत्र के युवाओं को प्रेरणा दी।
साहसिक बलिदान: कुमाऊँ क्षेत्र के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए बड़े-बड़े बलिदान दिए। सल्ट क्रांति (1942) के दौरान, खुमाड़ में निहत्थे लोगों पर ब्रिटिश सेना ने गोलीबारी की, जिसमें कई लोग शहीद हो गए। महात्मा गांधी ने सल्ट को ‘कुमाऊँ की बारदोली’ कहकर इस क्षेत्र के बलिदान को श्रद्धांजलि दी। ये घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कुमाऊँ के लोग अपने जीवन का बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, कुमाऊँ क्षेत्र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुली बेगार प्रथा के सफल विरोध से लेकर बौद्धिक जागरण और युवाओं की भागीदारी तक, इस क्षेत्र ने हर मोर्चे पर अपना योगदान दिया। बद्रीदत्त पांडे और गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेताओं ने यहाँ के आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। इस तरह, कुमाऊँ क्षेत्र न केवल उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का केंद्र बना, बल्कि इसने एक नए सामाजिक और राजनीतिक जागरण का मार्ग भी प्रशस्त किया।