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स्वतंत्रता संग्राम के नायक: बद्रीदत्त पांडे और गोविंद बल्लभ पंत

प्रस्तावना:

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड का योगदान अविस्मरणीय है, और इस योगदान को संभव बनाने का श्रेय दो महान नेताओं को जाता है: बद्रीदत्त पांडे और गोविंद बल्लभ पंत। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में नेतृत्व की बागडोर संभाली और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़कर इस क्षेत्र में एक नई राजनीतिक चेतना का संचार किया। उनकी दूरदर्शिता और अथक प्रयासों ने उत्तराखंड को भारत के व्यापक संघर्ष का एक मजबूत हिस्सा बना दिया।

पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय विचारों का प्रसार: बद्रीदत्त पांडे, जिन्हें ‘कुमाऊँ केसरी’ के नाम से भी जाना जाता है, ने ‘अल्मोड़ा अखबार’ के संपादक के रूप में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने इस साप्ताहिक समाचार पत्र को ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना करने और राष्ट्रवादी विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनाया। उनके प्रभावशाली लेखों ने लोगों को न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया, बल्कि उनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित होने की भावना भी जगाई।

कुली बेगार प्रथा के खिलाफ निर्णायक संघर्ष: बद्रीदत्त पांडे का सबसे महत्वपूर्ण योगदान कुली बेगार प्रथा के उन्मूलन में था। इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ उन्होंने जनता को संगठित किया और 1921 में बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर कुली रजिस्टरों को बहाकर इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। यह घटना उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन में एक निर्णायक मोड़ थी, जिसने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि अहिंसक प्रतिरोध से भी बदलाव लाया जा सकता है।

कुमाऊँ परिषद् की स्थापना: गोविंद बल्लभ पंत एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे और उन्होंने 1916 में कुमाऊँ परिषद् की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य कुमाऊँ के स्थानीय मुद्दों जैसे वन अधिकार, भू-राजस्व और कुली बेगार को उठाना था। परिषद् ने लोगों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए बैठकों, सम्मेलनों और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया। यह कुमाऊँ के युवा नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रशिक्षण का केंद्र बन गया।

स्थानीय संघर्षों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना: गोविंद बल्लभ पंत ने उत्तराखंड के स्थानीय संघर्षों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। वे बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता बने और उन्होंने राष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इस क्षेत्र की समस्याएँ और योगदान राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाएँ। पंत जी ने असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे राष्ट्रीय अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

पत्रकारिता और नेतृत्व का समन्वय: बद्रीदत्त पांडे की पत्रकारिता और गोविंद बल्लभ पंत के कुशल राजनीतिक नेतृत्व ने मिलकर काम किया। पांडे ने अपने लेखों से बौद्धिक और वैचारिक आधार प्रदान किया, जबकि पंत ने संगठन और जमीनी स्तर पर नेतृत्व प्रदान किया। इन दोनों ने लोगों को प्रेरित किया, उन्हें एकजुट किया और उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया, जिससे उत्तराखंड इस संघर्ष का एक मजबूत स्तंभ बन गया।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, बद्रीदत्त पांडे और गोविंद बल्लभ पंत का योगदान उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी पत्रकारिता और नेतृत्व के माध्यम से लोगों में राजनीतिक चेतना जगाई, स्थानीय शोषण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया और उत्तराखंड को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा। उनके प्रयासों ने न केवल उत्तराखंड को स्वतंत्रता संग्राम में एक गौरवशाली स्थान दिलाया, बल्कि भविष्य के नेताओं के लिए एक मजबूत नींव भी रखी।

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