प्रस्तावना:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र का योगदान अविस्मरणीय है। जहाँ कुमाऊँ ने अपने अहिंसक प्रतिरोधों और बौद्धिक जागरण के लिए पहचान बनाई, वहीं गढ़वाल ने नागरिक अवज्ञा और सैन्य विद्रोह दोनों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। इस क्षेत्र के लोगों ने, अपने साहस, दृढ़ता और देशभक्ति के साथ, यह साबित कर दिया कि वे भी स्वतंत्रता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी: महात्मा गांधी के आह्वान पर 1920-22 के असहयोग आंदोलन में गढ़वाल के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने ब्रिटिश संस्थानों, स्कूलों और अदालतों का बहिष्कार किया और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाया। इस क्षेत्र में नेताओं और आम जनता ने मिलकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए, जिससे ब्रिटिश प्रशासन को यह एहसास हुआ कि उनकी पकड़ अब कमजोर हो रही है।
कुशल नेतृत्व: अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और इंद्र सिंह नयाल जैसे गढ़वाल के प्रमुख नेताओं ने किसानों और युवाओं को ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और उन्हें राजनीतिक रूप से संगठित किया। इन नेताओं ने स्थानीय मुद्दों को उठाया और उन्हें बड़े राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा, जिससे जनता की भागीदारी और भी बढ़ गई।
पेशावर कांड में सैन्य विरोध: 1930 का पेशावर कांड गढ़वाल के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय है। इस घटना में, गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने, जिसका नेतृत्व वीर चंद्र सिंह गढ़वाली कर रहे थे, अपने ब्रिटिश कमांडरों के निहत्थे अफगान स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने के आदेश को मानने से इनकार कर दिया। उनका यह विद्रोह न केवल देशभक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, बल्कि इसने यह भी साबित कर दिया कि भारतीय सैनिक भी मानवता और अपने देशवासियों के प्रति वफादारी रखते हैं।
क्रांतिकारी और सामाजिक सुधारक: गढ़वाल क्षेत्र ने कई क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों को भी जन्म दिया। इन लोगों ने अपनी लेखनी, भाषणों और सक्रियता से लोगों में स्वशासन और ‘स्वराज’ के बारे में जागरूकता फैलाई। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों को दूर करने और लोगों को एक मजबूत राष्ट्र के लिए तैयार करने का काम भी किया।
नागरिक प्रतिरोध और सैन्य अवहेलना का संयोजन: गढ़वाल क्षेत्र की भूमिका इस मायने में अनूठी है कि यहाँ नागरिक प्रतिरोध (जैसे कि असहयोग आंदोलन में भागीदारी) और सैन्य अवहेलना (पेशावर कांड) दोनों का संयोजन देखने को मिलता है। यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए हर संभव रास्ते से संघर्ष किया। टिहरी राज्य में श्रीदेव सुमन के नेतृत्व में चला आंदोलन भी इसी संघर्ष का हिस्सा था, जहाँ उन्होंने लोकतंत्र के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, गढ़वाल क्षेत्र ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ के लोगों ने न केवल अहिंसक प्रतिरोध में भाग लिया, बल्कि गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने भी अपनी देशभक्ति का परिचय दिया। अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और इंद्र सिंह नयाल जैसे नेताओं के कुशल मार्गदर्शन में, गढ़वाल ने एक ऐसे आंदोलन को जन्म दिया, जिसने ब्रिटिश शासन को लगातार चुनौती दी। इस तरह, गढ़वाल क्षेत्र ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक गौरवशाली और स्थायी योगदान दिया।