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भारत शासन अधिनियम, 1935 और भारतीय संवैधानिक विकास

प्रस्तावना:

भारत के संवैधानिक इतिहास में भारत शासन अधिनियम 1935 सबसे व्यापक और महत्वपूर्ण सुधार अधिनियम माना जाता है। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया और 1 अप्रैल 1937 से लागू हुआ। यद्यपि इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया, लेकिन इसने भारतीय प्रांतों को स्वायत्तता प्रदान की और बाद में भारतीय संविधान के निर्माण की नींव रखी।

प्रमुख प्रावधान

प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)

  • 1919 के मोंटाग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की द्वैध शासन या दोहरी सरकार प्रणाली (dyarchy) को समाप्त कर दिया गया।
  • प्रांतों में पूर्ण स्वायत्तता दी गई जहाँ मंत्रिपरिषदें निर्वाचित विधानसभाओं के प्रति उत्तरदायी थीं।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि जैसे विभाग भारतीय मंत्रियों को सौंप दिए गए।

संघीय संरचना (Federal Structure)

  • अधिनियम ने भारत को संघीय ढाँचा देने का प्रस्ताव रखा। इसमें प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक अखिल संघीय सरकार स्थापित करनी थी।
  • यद्यपि देशी रियासतें स्वेच्छा से इसमें शामिल होतीं, मगर अधिकांश ने सहयोग नहीं किया, इसलिए यह व्यवस्था लागू नहीं हो सकी।

केंद्रीय विधानमंडल

  • केंद्र में द्विसदनीय (Bicameral) विधानमंडल की व्यवस्था की गई:
  1. संघीय विधानसभा (Federal Assembly)
  2. परिषद् (Council of States)
  • इस तरह केंद्र में एक आंशिक रूप से निर्वाचित लोकतांत्रिक ढाँचे की शुरुआत हुई।

निर्वाचन व्यवस्था और पृथक निर्वाचक मंडल

  • मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, यूरोपियनों और व्यवसायिक वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) जारी रखी गई।
  • इससे साम्प्रदायिक राजनीति को प्रोत्साहन मिला।

अन्य प्रावधान

  • संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना का प्रावधान किया गया।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्थापना 1935 के अधिनियम के तहत हुई, जिसने भारतीय मुद्रा व वित्तीय ढांचे को नियंत्रित करना शुरू किया।
  • गवर्नर-जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को आवश्यक अधिकार देकर ब्रिटिश हितों की रक्षा सुनिश्चित की गई।

महत्व और प्रभाव

  • इस अधिनियम ने पहली बार प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन की स्थापना की, जिससे भारतीय मंत्रियों को वास्तविक अधिकार मिले।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 के चुनावों में भाग लेकर आठ प्रांतों में अपनी सरकारें बनाईं, जो भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के अभ्यास की दिशा में बड़ा कदम था।
  • यद्यपि संघीय ढाँचा लागू नहीं हो सका, लेकिन इससे केंद्र और राज्य संबंधों की अवधारणा को जन्म मिला।
  • रिज़र्व बैंक और संघीय न्यायालय जैसी संस्थाएँ भविष्य में भारतीय संविधान का आधार बनीं।
  • पृथक निर्वाचक मंडल ने भारत में साम्प्रदायिकता को और गहरा किया, जिसका नकारात्मक प्रभाव अंततः देश के विभाजन में दिखाई दिया।

निष्कर्ष:

भारत शासन अधिनियम 1935, ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया सबसे विस्तृत संवैधानिक ढाँचा था। इसने भारतीयों को सीमित राजनीतिक अधिकार, प्रांतीय स्वायत्तता और आधुनिक संस्थागत ढांचा उपलब्ध कराया। हालाँकि इसमें साम्प्रदायिकता और ब्रिटिश हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली कमियाँ थीं, फिर भी इस अधिनियम ने भारत को शासन और संविधान निर्माण का व्यावहारिक अनुभव दिया। इसी कारण यह अधिनियम स्वतंत्र भारत के संविधान का पूर्वज माना जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQS) और उत्तर

प्रश्न 1. भारत शासन अधिनियम कब लागू हुआ?
(a) 15 अगस्त 1935
(b) 1 अप्रैल 1937
(c) 26 जनवरी 1936
(d) 2 अक्टूबर 1937

उत्तर: (b) 1 अप्रैल 1937
व्याख्या: भारत शासन अधिनियम 1935 ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया गया और 1 अप्रैल 1937 से लागू हुआ। यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे विस्तृत विधेयक था। इसने पहली बार प्रांतीय स्तर पर स्वायत्तता की व्यवस्था की और भारतीय मंत्रिपरिषदों को वास्तविक प्रशासनिक अधिकार प्रदान किए, जिससे भारतीय राजनीति में उत्तरदायी शासन का आरंभ हुआ।

प्रश्न 2. भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा किस सुधार को समाप्त किया गया था?
(a) द्वैध शासन प्रणाली (dyarchy)
(b) पृथक निर्वाचन प्रणाली
(c) केंद्रीकृत प्रशासन
(d) संघीय ढाँचा

उत्तर: (a) द्वैध शासन प्रणाली (dyarchy)
व्याख्या: 1919 के मोंटाग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के तहत लागू द्वैध शासन प्रणाली में प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया था। लेकिन 1935 के अधिनियम ने इसे समाप्त कर पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता स्थापित की। अब निर्वाचित मंत्रिपरिषदें प्रांतीय विधानसभाओं के प्रति उत्तरदायी थीं। यह भारतीय स्व-शासन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।

प्रश्न 3. भारत शासन अधिनियम, 1935 ने भारत को किस प्रकार की राजनीतिक संरचना प्रदान करने का प्रयास किया?
(a) एकात्मक शासन
(b) संघीय संरचना
(c) सैन्य शासन
(d) सामंती व्यवस्था

उत्तर: (b) संघीय संरचना
व्याख्या: अधिनियम ने भारत को पहली बार संघीय ढाँचे का प्रस्ताव दिया, जिसमें ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संघ बनाने की बात थी। यद्यपि यह व्यवस्था व्यवहार में नहीं आ सकी क्योंकि अधिकांश रियासतों ने शामिल होने से इंकार किया। तथापि, इस अवधारणा ने स्वतंत्र भारत के संघीय संविधान की नींव डाली।

प्रश्न 4. भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत किस संस्था की स्थापना का प्रावधान किया गया?
(a) निर्वाचन आयोग
(b) सर्वोच्च न्यायालय
(c) भारतीय रिज़र्व बैंक और संघीय न्यायालय
(d) अंतर्राष्ट्रीय संबंध मंत्रालय

उत्तर: (c) भारतीय रिज़र्व बैंक और संघीय न्यायालय
व्याख्या: 1935 के अधिनियम के तहत पहली बार दो महत्वपूर्ण संस्थाओं का गठन किया गया—भारतीय रिज़र्व बैंक (rbi) और संघीय न्यायालय। rbi को भारत की मौद्रिक नीति और मुद्रा नियंत्रण का उत्तरदायित्व सौंपा गया, जबकि संघीय न्यायालय को केंद्र-राज्य विवादों के समाधान हेतु स्थापित किया गया। दोनों संस्थाएँ आधुनिक भारत के संवैधानिक ढाँचे की आधारशिला बनीं।

प्रश्न 5. भारत शासन अधिनियम, 1935 का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा?
(a) साम्प्रदायिकता समाप्त हो गई
(b) कांग्रेस ने चुनावों का बहिष्कार किया
(c) भारतीय प्रांतों में उत्तरदायी शासन की शुरुआत हुई
(d) ब्रिटिश शासन और मजबूत हुआ

उत्तर: (c) भारतीय प्रांतों में उत्तरदायी शासन की शुरुआत हुई
व्याख्या: 1935 के अधिनियम ने पहली बार प्रांतीय स्तर पर उत्तरदायी शासन की अवधारणा को लागू किया। भारतीय मंत्रिपरिषदें अब निर्वाचित विधानसभाओं के प्रति जवाबदेह थीं। कांग्रेस ने 1937 के चुनावों में भाग लेकर आठ प्रांतों में सरकार बनाई। इससे भारतीय नेताओं को प्रशासनिक अनुभव मिला, जिसने स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक शासन की पृष्ठभूमि तैयार की।

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