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भारत में मौलिक अधिकारों का महत्व – समालोचना

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान ने नागरिकों को उच्चतम प्राथमिकता देते हुए उन्हें मौलिक अधिकार प्रदान किए हैं। ये अधिकार नागरिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय की गारंटी देते हैं और लोकतांत्रिक भारत की आत्मा माने जाते हैं। संविधान का भाग-III मौलिक अधिकारों का विस्तृत प्रावधान करता है और इन्हें लागू कराने हेतु सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। लेकिन इन अधिकारों के साथ-साथ कुछ आलोचनाएँ भी जुड़ी हैं।

मौलिक अधिकारों का महत्व

  1. नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी
    मौलिक अधिकार व्यक्तियों को राज्य की मनमानी से सुरक्षा प्रदान करते हैं। कानून के शासन (Rule of Law) के अंतर्गत यह नागरिकों को एक समान दर्जा सुनिश्चित करते हैं।
  2. समानता और जीवन की रक्षा
    संविधान अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। ये प्रावधान नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर देते हैं।
  3. राजनीतिक लोकतंत्र की नींव
    मौलिक अधिकार लोकतंत्र को कार्यशील बनाने में सहायक हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता और मतदान के अधिकार लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करते हैं।
  4. संवैधानिक उपचार का अधिकार
    अनुच्छेद 32 नागरिकों को यह शक्ति देता है कि यदि उनके अधिकारों का उल्लंघन हो तो वे सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकते हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे संविधान का हृदय और आत्मा कहा।

मौलिक अधिकारों की आलोचना

  1. अधिकार पूर्ण नहीं, प्रतिबंध सहित
    मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि उन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इससे कभी-कभी इन अधिकारों की उपयोगिता सीमित हो जाती है।
  2. सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की कमी
    प्रारंभिक संविधान में स्वास्थ्य, आजीविका या शिक्षा जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किए गए। बाद में शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) जोड़ा गया, परंतु अन्य अधिकार अभी भी नीति निर्देशक तत्वों तक सीमित हैं।
  3. आपातकाल में निलंबन
    आपातकालीन परिस्थितियों में अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं। विशेषकर 1975-77 की आपात स्थिति ने बताया कि इस प्रावधान से नागरिक स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
  4. न्यायिक व्याख्या पर निर्भरता
    इन अधिकारों के क्रियान्वयन और संरक्षण की अंतिम शक्ति न्यायपालिका के पास है। न्यायालयों की व्याख्या बदलने से अधिकारों के दायरे और स्वरूप में भी परिवर्तन हो सकता है।

निष्कर्ष:

मौलिक अधिकार भारतीय लोकतंत्र की धुरी हैं, जिनके बिना नागरिक स्वतंत्रता और न्याय की कल्पना अधूरी है। यद्यपि इन पर आलोचनाएँ की जाती हैं—जैसे कि प्रतिबंध, अपूर्णता और आपातकालीन निलंबन—फिर भी यह तथ्य अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि मौलिक अधिकारों ने भारत के लोकतांत्रिक और गणराज्य स्वरूप को मजबूत किया है। समय और न्यायपालिका की व्याख्याओं ने इन्हें और व्यापक बनाते हुए सामाजिक-आर्थिक आयाम भी जोड़े हैं। इस प्रकार, मौलिक अधिकार भारतीय संविधान की आत्मा और लोकतंत्र की आधारशिला बने हुए हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1: भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार किस भाग में वर्णित हैं?
A) भाग-I
B) भाग-III
C) भाग-IV
D) भाग-V

सही उत्तर: B) भाग-III

स्पष्टीकरण:
भारतीय संविधान का भाग-III मौलिक अधिकारों से संबंधित है। इसमें समानता, स्वतंत्रता, शोषण से मुक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार तथा संवैधानिक उपचार जैसे अधिकार शामिल हैं। इनका उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को इन अधिकारों को लागू कराने की विशेष शक्ति दी गई है जिससे नागरिक स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके।

प्रश्न 2: संविधान का कौन-सा अनुच्छेद मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है?
A) अनुच्छेद 14
B) अनुच्छेद 19
C) अनुच्छेद 32
D) अनुच्छेद 21

सही उत्तर: C) अनुच्छेद 32

स्पष्टीकरण:
अनुच्छेद 32 नागरिकों को संवैधानिक उपचार का अधिकार प्रदान करता है। यदि किसी नागरिक का मौलिक अधिकार उल्लंघन होता है तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण अधिकार है क्योंकि इसके माध्यम से अन्य सभी मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित होती है।

प्रश्न 3: मौलिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंध किस आधार पर उचित माने जाते हैं?
A) राज्य की इच्छा
B) न्यायपालिका के आदेश
C) युक्तिसंगत प्रतिबंध
D) कठोर दंड व्यवस्था

सही उत्तर: C) युक्तिसंगत प्रतिबंध

स्पष्टीकरण:
मौलिक अधिकार पूरी तरह निरपेक्ष नहीं हैं। संविधान निर्माताओं ने इन्हें युक्तिसंगत प्रतिबंधों के साथ प्रदान किया है ताकि समाज और राष्ट्र की सुरक्षा बनी रहे। उदाहरण के लिए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सुरक्षा के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक हित में संतुलन सुनिश्चित करने के लिए है, हालांकि कभी-कभी इसकी आलोचना होती है।

प्रश्न 4: भारतीय संविधान में प्रारंभिक रूप से कौन-सा सामाजिक-आर्थिक अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं था?
A) शिक्षा का अधिकार
B) स्वतंत्रता का अधिकार
C) समानता का अधिकार
D) जीवन का अधिकार

सही उत्तर: A) शिक्षा का अधिकार

स्पष्टीकरण:
भारतीय संविधान में प्रारंभ में शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं था। बाद में 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा अनुच्छेद 21A जोड़ा गया, जिसने 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। पहले इसे नीति निर्देशक तत्वों में रखा गया था। इस व्यवस्था ने सामाजिक-आर्थिक अधिकारों को नया आयाम दिया और शिक्षा को सभी के लिए अनिवार्य बनाया।

प्रश्न 5: भारत में आपातकालीन परिस्थितियों में अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण किस अवधि में देखा गया?
A) 1947-1950
B) 1971-72
C) 1975-77
D) 1984-85

सही उत्तर: C) 1975-77

स्पष्टीकरण:
भारत में मौलिक अधिकारों का निलंबन 1975 से 1977 की आपात स्थिति के दौरान सबसे स्पष्ट रूप से देखा गया। इस अवधि में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। इसने नागरिक स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव डाला। यद्यपि संविधान ने यह प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा एवं आपात स्थितियों के लिए रखा था, लेकिन इसके दुरुपयोग की आलोचना व्यापक रूप से हुई।

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