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भारत में केंद्र-राज्य संबंधों का समालोचनात्मक मूल्यांकन

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का ऐसा संतुलन स्थापित किया है, जिससे देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण बनी रहे और साथ ही राज्यों को स्वायत्तता भी मिले। किंतु यह संतुलन पूर्णतः समान नहीं है। भारत की संघीय संरचना में स्पष्ट रूप से एकात्मक झुकाव देखा जाता है। इसका कारण भारत की विविधता, विशालता और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है। इस पृष्ठभूमि में केंद्र-राज्य संबंधों का मूल्यांकन विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टियों से किया जा सकता है।

  1. विधायी संबंध
  • संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत कानून बनाने के विषयों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया—संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची।
  • यद्यपि राज्यों को राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन अनुच्छेद 249 और 250 संसद को राष्ट्रीय हित या आपातकाल की स्थिति में राज्य सूची पर भी कानून बनाने का अधिकार देता है।
  • समवर्ती सूची में विवाद की स्थिति में हमेशा केंद्र का कानून ही प्रभावी होता है।
  • अवशिष्ट विषयों पर कानून बनाने का अधिकार भी केवल केंद्र के पास है।
    → अतः विधायी संबंधों में केंद्र की प्रमुखता स्पष्ट दिखाई देती है।
  1. प्रशासनिक संबंध
  • राज्यों के प्रशासनिक ढांचे का बड़ा हिस्सा केंद्र की नीतियों और दिशा-निर्देशों पर निर्भर करता है।
  • संविधान केंद्र को यह अधिकार देता है कि वह राष्ट्रीय हित में राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश दे।
  • राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।
  • अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS आदि) भी केंद्र द्वारा नियंत्रित की जाती हैं, जिससे प्रशासनिक मामलों में केंद्र की पकड़ मजबूत रहती है।
  1. वित्तीय संबंध
  • प्रमुख कर केंद्र के पास ही सुरक्षित हैं, जैसे आयकर, उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क।
  • राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर है और वे अनुदान एवं करों में हिस्सेदारी हेतु केंद्र पर निर्भर रहते हैं।
  • वित्त आयोग द्वारा संसाधनों के बंटवारे की अनुशंसा की जाती है, किन्तु अंतिम निर्णय केंद्र का ही होता है।
  • इससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
  1. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)
  • संविधान निर्माताओं ने केवल शक्ति संतुलन ही नहीं, बल्कि सहयोग पर भी ज़ोर दिया है।
  • नीति आयोग (NITI Aayog) और अंतरराज्यीय परिषद (Inter-State Council) केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श और सहयोग का मंच प्रदान करते हैं।
  • कई विकास योजनाएँ केंद्र और राज्यों के संयुक्त प्रयासों से ही सफल होती हैं।
  1. चुनौतियाँ
  • क्षेत्रवाद और राज्यों की अधिक स्वायत्तता की माँगें अनेक बार केंद्र-राज्य संबंधों को तनावपूर्ण बना देती हैं।
  • भिन्न राजनीतिक दलों के शासन के कारण भी टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, विशेषकर जब राज्यों को लगता है कि केंद्र पक्षपात कर रहा है।
  • वित्तीय असमानता और संसाधनों के अपर्याप्त बँटवारे की शिकायत भी राज्यों में असंतोष पैदा करती है।

निष्कर्ष:

भारत में केंद्र-राज्य संबंधों का स्वरूप एक मजबूत केंद्र की विशेषता वाला है। यह भारतीय विविधता और सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक भी है। किंतु साथ ही सहकारी संघवाद की भावना—जहाँ विकास और प्रशासन में केंद्र व राज्य मिलकर कार्य करें—भारत की संघीय एकता का मूल आधार है। अतः कहा जा सकता है कि भारतीय संघवाद की सफलता सुदृढ़ केंद्र और सहयोगपूर्ण शासन के संतुलन पर निर्भर है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1: संविधान की कौन-सी अनुसूची में विधायी शक्तियों का बंटवारा किया गया है?
(a) पाँचवीं अनुसूची
(b) सातवीं अनुसूची
(c) दसवीं अनुसूची
(d) बारहवीं अनुसूची

उत्तर: (b) सातवीं अनुसूची
व्याख्या: भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी विषयों को संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि किन विषयों पर केंद्र कानून बनाएगा और किन पर राज्य। साथ ही, अवशिष्ट शक्तियाँ केवल केंद्र के पास सुरक्षित हैं। यह भारत के संघीय ढांचे में केंद्र की प्रमुखता को दर्शाता है।

प्रश्न 2: संविधान का कौन-सा अनुच्छेद संसद को राज्य सूची पर भी कानून बनाने का अधिकार देता है?
(a) अनुच्छेद 368
(b) अनुच्छेद 352
(c) अनुच्छेद 249 और 250
(d) अनुच्छेद 370

उत्तर: (c) अनुच्छेद 249 और 250
व्याख्या: सामान्यतः राज्य सूची पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को है। लेकिन अनुच्छेद 249 के तहत संसद राष्ट्रीय हित में तथा अनुच्छेद 250 के तहत आपातकाल के समय राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। यह प्रावधान भारत की संघीय व्यवस्था में केंद्र की प्रमुखता और एकात्मक प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है।

प्रश्न 3: भारत में अक्षरशः प्रशासनिक नियंत्रण किसके पास अधिक है?
(a) राज्य सरकारों के पास
(b) केंद्र सरकार के पास
(c) स्थानीय निकायों के पास
(d) न्यायपालिका के पास

उत्तर: (b) केंद्र सरकार के पास
व्याख्या: केंद्र राज्यों पर प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखता है। संविधान केंद्र को राज्यों को दिशा-निर्देश देने का अधिकार देता है। इसके अलावा अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS, IPS आदि) केंद्र के अधीन होती हैं। साथ ही अनुच्छेद 356 के तहत संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। इससे प्रशासनिक दृष्टिकोण से केंद्र की पकड़ मजबूत होती है।

प्रश्न 4: भारत में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देने वाले संस्थान कौन-से हैं?
(a) संसद और उच्चतम न्यायालय
(b) नीति आयोग और अंतरराज्यीय परिषद
(c) चुनाव आयोग और लोकसभा
(d) कैबिनेट सचिवालय और विधानसभा

उत्तर: (b) नीति आयोग और अंतरराज्यीय परिषद
व्याख्या: सहकारी संघवाद का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाना है। नीति आयोग राज्यों को विकास योजनाओं में साझेदारी देता है और अंतरराज्यीय परिषद विभिन्न मुद्दों पर परामर्श का मंच प्रदान करती है। इससे विवाद कम होते हैं और विकास कार्यों में केंद्र व राज्य दोनों की सहभागिता सुनिश्चित होती है।

प्रश्न 5: भारत में केंद्र-राज्य संबंधों में मुख्य चुनौती कौन-सी है?
(a) न्यायपालिका की स्वतंत्रता
(b) क्षेत्रवाद, स्वायत्तता की माँग और वित्तीय असमानता
(c) नीति आयोग का गठन
(d) आपातकालीन शक्तियाँ

उत्तर: (b) क्षेत्रवाद, स्वायत्तता की माँग और वित्तीय असमानता
व्याख्या: भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कई बार क्षेत्रवाद और राज्यों की अधिक स्वायत्तता की माँगें सामने आती हैं, जिससे केंद्र-राज्य संबंध तनावपूर्ण होते हैं। इसके अतिरिक्त संसाधनों के बँटवारे में असमानता और राजनीतिक दलों के बीच मतभेद भी संबंधों को प्रभावित करते हैं। इन चुनौतियों के बावजूद सहकारी संघवाद को मजबूत करना भारत की संघीय एकता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

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