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भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता : एक आलोचनात्मक विश्लेषण

प्रस्तावना:

भारतीय संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में स्थापित किया है। इसका अभिप्राय यह है कि भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं होगा और सभी धर्मों को समान दर्जा मिलेगा। संविधान सभा की विचारधारा और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से प्रेरित होकर धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल भावना में समाहित किया गया। 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द को स्पष्ट रूप से जोड़ा गया।

भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएँ

  1. राज्य का कोई धर्म नहीं
    भारत में राज्य किसी विशेष धर्म को मान्यता नहीं देता और न ही किसी धर्म का पक्ष लेता है।
  2. प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता की घोषणा
    संविधान की प्रस्तावना देश को सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य घोषित करती है।
  3. मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता
    अनुच्छेद 25 से 28 तक नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की गई है। इसमें अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रचार-प्रसार का अधिकार शामिल है।
  4. सभी धर्मों के प्रति समान आदर
    भारतीय धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप सकारात्मक है। इसका अर्थ केवल राज्य और धर्म का अलगाव नहीं, बल्कि प्रत्येक धर्म को समान सम्मान और संरक्षण देना है।
  5. सिद्धांतगत दूरी (Principled Distance)
    राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखता है। आवश्यकता पड़ने पर वह धार्मिक संस्थाओं पर हस्तक्षेप कर सकता है, यदि सार्वजनिक हित और सामाजिक न्याय की आवश्यकता हो।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियाँ

  1. साम्प्रदायिकता (Communalism)
    धार्मिक आधार पर राजनीति और हिंसा धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी चुनौती है।
  2. जातिगत राजनीति
    भारत में धर्म और जाति की गहरी जड़े होने से धर्मनिरपेक्षता प्रभावित होती है। राजनीतिक दल अक्सर वोट बैंक की राजनीति में इसे कमजोर कर देते हैं।
  3. धार्मिक असहिष्णुता
    समाज में कई बार धार्मिक असहिष्णुता देखी जाती है, जिसका परिणाम सामाजिक असमानता और तनाव के रूप में सामने आता है।
  4. राज्य की व्यावहारिक कठिनाइयाँ
    राज्य को धार्मिक स्वतंत्रता और सामुदायिक सद्भाव के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है, जिसके कारण अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं।

निष्कर्ष:

भारतीय धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप पश्चिमी देशों से भिन्न है। भारत ने धार्मिक स्वतंत्रता, समान सम्मान और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का मार्ग चुना है। यद्यपि साम्प्रदायिकता, जातिगत राजनीति और धार्मिक असहिष्णुता जैसी चुनौतियाँ इसके सामने हैं, फिर भी धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की मूल संरचना और भारतीय लोकतंत्र की नींव बनी हुई है। इसलिए नागरिकों और शासन—दोनों को मिलकर इसे सशक्त और प्रभावी बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उत्तर (MCQs)

प्रश्न 1: भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया था?
A) 44वाँ संशोधन, 1978
B) 42वाँ संशोधन, 1976
C) 52वाँ संशोधन, 1985
D) 61वाँ संशोधन, 1989

सही उत्तर: B) 42वाँ संशोधन, 1976

स्पष्टीकरण:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द 42वें संशोधन (1976) के द्वारा जोड़ा गया। इस संशोधन ने “सर्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” की परिभाषा को स्पष्ट किया। यद्यपि संविधान की भावना में पहले से ही धर्मनिरपेक्षता निहित थी, किंतु इस संशोधन ने इसे औपचारिक मान्यता दी। यह सुनिश्चित करता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और सभी धर्मों को समान सम्मान दिया जाएगा।

प्रश्न 2: भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधान किस अनुच्छेदों में दिए गए हैं?
A) अनुच्छेद 14 से 18
B) अनुच्छेद 19 से 22
C) अनुच्छेद 25 से 28
D) अनुच्छेद 32 से 35

सही उत्तर: C) अनुच्छेद 25 से 28

स्पष्टीकरण:
संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार शामिल हैं। इनके अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका प्रचार करने और धार्मिक प्रचार-प्रसार करने का अधिकार है। साथ ही, धर्म संबंधी शिक्षा और कराधान से भी स्वतंत्रता दी गई है। ये प्रावधान भारतीय धर्मनिरपेक्षता के प्रमुख आधार हैं क्योंकि ये नागरिकों को धार्मिक मामलों में समान स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

प्रश्न 3: भारतीय धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा स्वरूप इसे पश्चिमी देशों से अलग करता है?
A) नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता
B) केवल राज्य और धर्म का अलगाव
C) सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता
D) धार्मिक असहिष्णुता

सही उत्तर: C) सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता

स्पष्टीकरण:
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप सकारात्मक है। इसका अर्थ केवल राज्य और धर्म के बीच दूरी बनाए रखना नहीं है, बल्कि सभी धर्मों को समान सम्मान और संरक्षण देना है। आवश्यकता पड़ने पर राज्य सामाजिक न्याय और सार्वजनिक हित के लिए धार्मिक संस्थाओं में हस्तक्षेप भी कर सकता है। यह भारतीय परिस्थिति के अनुरूप एक व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण है।

प्रश्न 4: भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सामने सबसे बड़ी चुनौती कौन-सी है?
A) औद्योगीकरण
B) साम्प्रदायिकता
C) वैश्वीकरण
D) शिक्षा का विस्तार

सही उत्तर: B) साम्प्रदायिकता

स्पष्टीकरण:
भारतीय धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी चुनौती साम्प्रदायिकता है। जब धार्मिक पहचान को राजनीति और हिंसा के आधार के रूप में प्रयोग किया जाता है, तो यह साम्प्रदायिक तनाव और विभाजन को जन्म देता है। इससे सामाजिक एकता कमजोर होती है और लोकतांत्रिक मूल्यों को खतरा पहुँचता है। संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता साम्प्रदायिकता से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है, इसलिए यह स्थायी चुनौती है।

प्रश्न 5: “सिद्धांतगत दूरी” (Principled Distance) का अर्थ भारतीय धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में क्या है?
A) राज्य केवल हिंदू धर्म को बढ़ावा देगा
B) राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखेगा
C) राज्य धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण नहीं करेगा
D) राज्य धर्म विरोधी रहेगा

सही उत्तर: B) राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखेगा

स्पष्टीकरण:
भारतीय धर्मनिरपेक्षता में “सिद्धांतगत दूरी” का अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य पूर्णत: हस्तक्षेपहीन रहेगा। बल्कि जब सामाजिक न्याय और सार्वजनिक हित की आवश्यकता हो, तो राज्य धार्मिक संस्थाओं के मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है। यह दृष्टिकोण भारतीय धर्मनिरपेक्षता को व्यावहारिक और लचीला बनाता है।

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