प्रस्तावना:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में लाहौर अधिवेशन (1929) एक ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ था। यह अधिवेशन 29 दिसंबर 1929 को लाहौर (अब पाकिस्तान में) में आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वराज्य (Complete Independence) को अपना लक्ष्य घोषित किया। इससे स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक स्पष्टता और नई दिशा प्राप्त हुई।
अधिवेशन की प्रमुख विशेषताएँ
- अध्यक्षता – यह अधिवेशन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिससे युवा नेतृत्व की भूमिका स्पष्ट हुई और आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।
- पूर्ण स्वराज्य प्रस्ताव – अधिवेशन में ऐतिहासिक संकल्प लिया गया कि अब भारत का अंतिम लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता है, न कि केवल डोमिनियन स्टेटस।
- डोमिनियन स्टेटस का अस्वीकार – ब्रिटिश सरकार ने भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन प्रभुत्व-शाली राज्य (Dominion Status) देने की बात की थी, लेकिन कांग्रेस ने इसे पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।
- स्वतंत्रता दिवस की घोषणा – यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। इसके माध्यम से जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया।
स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
- वैचारिक स्पष्टता – इस अधिवेशन ने राष्ट्रीय आंदोलन को यह दिशा दी कि अब उसका अंतिम लक्ष्य केवल सुधार या सीमित अधिकार नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता है।
- जन-जागरण – 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। पंचायतों, कस्बों और नगरों में झंडारोहण हुआ। इससे आम जनता की भागीदारी बढ़ी।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रेरणा – लाहौर अधिवेशन के संकल्प ने सीधे तौर पर सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) की पृष्ठभूमि तैयार की, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को नया आयाम दिया।
- युवा नेतृत्व का उदय – जवाहरलाल नेहरू के अध्यक्ष बनने से यह संदेश गया कि अब स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व युवा शक्ति संभालेगी, जिससे राष्ट्रवाद का उत्साह बढ़ा।
- राष्ट्रीय प्रतीकों का प्रचार – अधिवेशन में तिरंगा झंडा फहराया गया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को प्रतीकों के स्तर पर एकता और पहचान दी।
- विदेशी प्रभाव और प्रेरणा – अधिवेशन में विश्व की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक आंदोलनों से प्रेरणा लेने पर भी बल दिया गया।
महत्व
लाहौर अधिवेशन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक विचारधारा प्रदान की। इसके बाद भारतीय जनता का लक्ष्य स्पष्ट रूप से “पूर्ण स्वराज्य” हो गया। 1930 में जब पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया तो देश के कोने-कोने में जनता ने इसे अपनाया, जिससे आंदोलन सचमुच जन-आधारित बन गया।
निष्कर्ष:
लाहौर अधिवेशन (1929) भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का ऐतिहासिक मील का पत्थर था। इसने स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक दिशा तय की और “पूर्ण स्वराज्य” को राष्ट्रीय ध्येय बना दिया। इस अधिवेशन के निर्णयों ने जनता को व्यापक रूप से संगठित किया और आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया। इसी कारण लाहौर अधिवेशन को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वास्तविक क्रांतिकारी घड़ी माना जाता है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQS) और उत्तर
प्रश्न 1. लाहौर अधिवेशन (1929) की अध्यक्षता किसने की थी?
(a) महात्मा गांधी
(b) सुभाष चंद्र बोस
(c) जवाहरलाल नेहरू
(d) मोतीलाल नेहरू
उत्तर: (c) जवाहरलाल नेहरू
व्याख्या: 1929 का लाहौर अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में महत्वपूर्ण था क्योंकि इसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। यह पहली बार था जब कांग्रेस की बागडोर युवा नेतृत्व के हाथों में आई। नेहरू के नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा, जोश और वैचारिक स्पष्टता प्रदान की, जिससे “पूर्ण स्वराज्य” का नारा राष्ट्रीय लक्ष्य बना।
प्रश्न 2. लाहौर अधिवेशन (1929) में कांग्रेस ने किस लक्ष्य को अपनाया?
(a) डोमिनियन स्टेटस
(b) सीमित प्रतिनिधि शासन
(c) पूर्ण स्वराज्य
(d) क्रांतिकारी आंदोलन
उत्तर: (c) पूर्ण स्वराज्य
व्याख्या: लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार “पूर्ण स्वराज्य” यानी सम्पूर्ण स्वतंत्रता को अपना अंतिम उद्देश्य घोषित किया। इससे पूर्व आंदोलन सीमित सुधारों और प्रभुत्व-शाली राज्य (dominion status) की मांगों तक सीमित थे। इस संकल्प ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नया मोड़ दिया और स्वतंत्रता प्राप्ति की दिशा में इसे स्पष्ट रूप से अग्रसर किया।
प्रश्न 3. लाहौर अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार के किस प्रस्ताव को अस्वीकार किया गया था?
(a) साइमन आयोग की रिपोर्ट
(b) क्रिप्स मिशन प्रस्ताव
(c) ब्रिटिश प्रभुत्व के अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस
(d) माउंटबेटन योजना
उत्तर: (c) ब्रिटिश प्रभुत्व के अंतर्गत डोमिनियन स्टेटस
व्याख्या: ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन डोमिनियन स्टेटस (प्रभुत्व-शाली राज्य) के रूप में बना रहे, परंतु कांग्रेस ने इसे लाहौर अधिवेशन में सख्ती से अस्वीकार किया। कांग्रेस का मानना था कि केवल डोमिनियन स्टेटस से वास्तविक स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। इस निर्णायक विरोध ने स्वतंत्र भारत की वैचारिक नींव रखी।
प्रश्न 4. लाहौर अधिवेशन के निर्णय के अनुसार स्वतंत्रता दिवस कब मनाया गया?
(a) 26 जनवरी 1930
(b) 15 अगस्त 1930
(c) 2 अक्टूबर 1930
(d) 12 मार्च 1931
उत्तर: (a) 26 जनवरी 1930
व्याख्या: लाहौर अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। इस दिन गांवों, नगरों और कस्बों में तिरंगा झंडा फहराया गया और पूर्ण स्वराज्य की शपथ ली गई। इसी दिन को प्रतीकात्मक रूप से भारतीय जनता के स्वतंत्रता अभियान की शुरुआत माना गया, जिसने सविनय अवज्ञा आंदोलन को प्रेरित किया।
प्रश्न 5. लाहौर अधिवेशन का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?
(a) क्रांतिकारियों का विरोध हुआ
(b) कांग्रेस विभाजित हो गई
(c) पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य मिला
(d) आंदोलन अस्थायी रूप से समाप्त हो गया
उत्तर: (c) पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य मिला
व्याख्या: लाहौर अधिवेशन ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक मार्गदर्शन दिया। इसके बाद राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य आंशिक सुधार नहीं, बल्कि पूर्ण स्वराज्य बन गया। इस अधिवेशन ने जनता में एकता, नेतृत्व पर विश्वास और राष्ट्रीय ध्येय के प्रति समर्पण पैदा किया। इससे सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की पृष्ठभूमि बनी।