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पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र और सतत अवसंरचना विकास

परिचय

आधुनिक युग में, तीव्र आर्थिक विकास की दौड़ में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हालाँकि, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि दीर्घकालिक समृद्धि और मानव कल्याण के लिए पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है। इसी संदर्भ में, ‘पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र’ (Eco-sensitive Zones – ESZs) और ‘सतत अवसंरचना विकास’ (Sustainable Infrastructure Development) की अवधारणाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र वे अधिसूचित क्षेत्र हैं जो संरक्षित क्षेत्रों (जैसे राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य) के आसपास स्थित होते हैं, जिनका उद्देश्य इन संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक बफर जोन के रूप में कार्य करना और उनके आसपास की गतिविधियों को विनियमित करना है। वहीं, सतत अवसंरचना विकास का तात्पर्य ऐसी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण से है जो पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार हों, सामाजिक रूप से न्यायसंगत हों और आर्थिक रूप से व्यवहार्य हों। ये दोनों अवधारणाएँ विशेष रूप से हिमालय जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों में, जहाँ अनियोजित विकास के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र और सतत अवसंरचना विकास के प्रमुख पहलू:

पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESZs) की परिभाषा और उद्देश्य: पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (ESZs) वे अधिसूचित क्षेत्र हैं जो राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास 10 किलोमीटर तक के दायरे में फैलाए जाते हैं, हालाँकि विशिष्ट मामलों में यह सीमा कम या अधिक हो सकती है। इनका मुख्य उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक “शॉक एब्जॉर्बर” के रूप में कार्य करना है, जिससे इन संवेदनशील क्षेत्रों पर मानवीय गतिविधियों का नकारात्मक प्रभाव कम हो सके। ये क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा और वन्यजीवों के लिए गलियारों को बनाए रखने में मदद करते हैं।

कानूनी ढाँचा (भारत के संदर्भ में): भारत में, पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया जाता है। यह अधिनियम केंद्र सरकार को पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए उपाय करने का अधिकार देता है, जिसमें विशिष्ट क्षेत्रों को विनियमित करना भी शामिल है। ESZs के प्रबंधन के लिए एक व्यापक दिशानिर्देश और विनियमन ढाँचा मौजूद है जो इन क्षेत्रों में अनुमेय और प्रतिबंधित गतिविधियों को परिभाषित करता है।

ESZs में अनुमेय और विनियमित गतिविधियाँ: ESZs में सभी गतिविधियाँ प्रतिबंधित नहीं होतीं, बल्कि उन्हें विनियमित किया जाता है।

  • प्रतिबंधित गतिविधियाँ: वाणिज्यिक खनन, प्रदूषणकारी उद्योग, प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएँ, लकड़ी आधारित उद्योग, और बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक होटल/रिसॉर्ट का निर्माण आमतौर पर प्रतिबंधित होता है।
  • विनियमित गतिविधियाँ: पेड़ों की कटाई, पर्यटन गतिविधियाँ, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, और बुनियादी ढाँचा विकास (जैसे सड़कें, बिजली लाइनें) को सख्त नियमों के तहत विनियमित किया जाता है ताकि पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
  • अनुमेय गतिविधियाँ: स्थानीय समुदायों की कृषि और बागवानी प्रथाएँ, वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को प्रोत्साहित किया जाता है।

सतत अवसंरचना विकास की अवधारणा: सतत अवसंरचना विकास का अर्थ ऐसी भौतिक संरचनाओं और प्रणालियों (जैसे सड़कें, पुल, ऊर्जा संयंत्र, जल आपूर्ति, अपशिष्ट प्रबंधन) का निर्माण, संचालन और रखरखाव करना है जो:

  • पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार हों (संसाधन दक्षता, प्रदूषण कम करना, पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान न पहुँचाना)।
  • सामाजिक रूप से न्यायसंगत हों (स्थानीय समुदायों को लाभ पहुँचाना, विस्थापन कम करना, भागीदारी सुनिश्चित करना)।
  • आर्थिक रूप से व्यवहार्य हों (दीर्घकालिक लागत-प्रभावशीलता, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना)।

सतत अवसंरचना के सिद्धांत: सतत अवसंरचना विकास कई प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है:

  • संसाधन दक्षता: ऊर्जा, पानी और सामग्री का न्यूनतम उपयोग।
  • पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना: प्रदूषण, अपशिष्ट और जैव विविधता के नुकसान को कम करना।
  • लचीलापन और अनुकूलनशीलता: जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने की क्षमता।
  • सामाजिक समावेशन: स्थानीय समुदायों की आवश्यकताओं और अधिकारों को प्राथमिकता देना।
  • जीवनचक्र दृष्टिकोण: डिजाइन से लेकर निर्माण, संचालन और अंततः विघटन तक पूरे जीवनचक्र का विचार करना।

नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों में आवश्यकता (विशेषकर हिमालय में): हिमालय जैसे पारिस्थितिकी रूप से नाजुक और भूगर्भीय रूप से अस्थिर क्षेत्रों में, सतत अवसंरचना विकास की आवश्यकता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अनियोजित और गैर-टिकाऊ निर्माण से भूस्खलन, मिट्टी का कटाव, जल प्रदूषण और जैव विविधता का नुकसान होता है, जिससे आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है। सतत अवसंरचना इन जोखिमों को कम करती है और पारिस्थितिकी तंत्र की वहन क्षमता को बनाए रखती है।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ: ESZs और सतत अवसंरचना विकास को लागू करने में कई चुनौतियाँ हैं:

  • आर्थिक दबाव: विकास परियोजनाओं के लिए अक्सर त्वरित आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे पर्यावरणीय विचारों की अनदेखी होती है।
  • प्रवर्तन और निगरानी: ESZs में नियमों का प्रभावी प्रवर्तन और निगरानी एक चुनौती है, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
  • स्थानीय समुदायों का विरोध: कभी-कभी स्थानीय समुदाय ESZs में प्रतिबंधों को अपनी आजीविका के लिए खतरा मानते हैं, जिससे संघर्ष उत्पन्न होता है।
  • तकनीकी और वित्तीय बाधाएँ: सतत अवसंरचना के लिए उन्नत तकनीकों और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
  • समन्वय की कमी: विभिन्न सरकारी विभागों और हितधारकों के बीच समन्वय का अभाव कार्यान्वयन को धीमा कर सकता है।

लाभ और सकारात्मक प्रभाव: ESZs और सतत अवसंरचना विकास के कई लाभ हैं:

  • जैव विविधता संरक्षण: लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके आवासों की रक्षा।
  • प्राकृतिक आपदा जोखिम में कमी: भूस्खलन, बाढ़ और मिट्टी के कटाव को कम करना।
  • जल सुरक्षा: जल स्रोतों का संरक्षण और जल गुणवत्ता में सुधार।
  • स्थानीय आजीविका का समर्थन: सतत पर्यटन और जैविक खेती को बढ़ावा देना।
  • जलवायु परिवर्तन शमन और अनुकूलन: कार्बन उत्सर्जन को कम करना और पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक लचीला बनाना।

ESZs और सतत विकास का एकीकरण: ESZs और सतत अवसंरचना विकास एक दूसरे के पूरक हैं। ESZs एक नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं जो यह सुनिश्चित करता है कि संरक्षित क्षेत्रों के आसपास विकास पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ हो। दूसरी ओर, सतत अवसंरचना विकास ESZs के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है, क्योंकि यह पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार और सामाजिक रूप से समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।

भविष्य का रास्ता: प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, ESZs के बारे में जागरूकता बढ़ाना, स्थानीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना, सतत अवसंरचना परियोजनाओं के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना, और नियमों के सख्त प्रवर्तन को सुनिश्चित करना आवश्यक है।

यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

निष्कर्ष

पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र और सतत अवसंरचना विकास आधुनिक समय की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं जो हमें पर्यावरण संरक्षण और मानवीय प्रगति के बीच संतुलन बनाने में मदद करती हैं। विशेष रूप से हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में, ये अवधारणाएँ न केवल अद्वितीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करती हैं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करती हैं और स्थानीय समुदायों के लिए एक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित करती हैं। इन सिद्धांतों को विकास योजनाओं में गहराई से एकीकृत करके और चुनौतियों का समाधान करके ही हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहाँ प्रकृति और मानव समाज दोनों फल-फूल सकें।

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