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टिहरी राज्य में स्वतंत्रता संग्राम और श्रीदेव सुमन का बलिदान

प्रस्तावना:

जब भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम अपनी चरम सीमा पर था, तब कुछ भारतीय रियासतें भी इस संघर्ष का हिस्सा बन रही थीं। इनमें से एक थी टिहरी गढ़वाल रियासत, जहाँ ब्रिटिश शासन का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं था, लेकिन राजा अंग्रेजों के सहयोगी थे और जनता पर मनमाने ढंग से शासन करते थे। इस अन्याय और दमन के विरुद्ध आवाज उठाने का श्रेय श्रीदेव सुमन जैसे दूरदर्शी नेताओं को जाता है। उन्होंने एक ऐसे आंदोलन की नींव रखी, जिसने टिहरी की जनता को न केवल जागरूक किया, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस भी दिया।

रियासत में दमनकारी शासन: टिहरी गढ़वाल रियासत में राजा का शासन निरंकुश और दमनकारी था। जनता को राजनीतिक अधिकार नहीं थे, और राजा अंग्रेजों के संरक्षण में शोषण और अत्याचार करते थे। भूमि और वन कानूनों ने ग्रामीणों का जीवन मुश्किल बना दिया था। लोग बिना किसी अधिकार के जीने को मजबूर थे, और इस स्थिति ने एक मजबूत विरोध आंदोलन की आवश्यकता को जन्म दिया।

प्रजामंडल की स्थापना: इस दमनकारी शासन के खिलाफ संघर्ष को संगठित रूप देने के लिए 1939 में ‘प्रजामंडल’ की स्थापना हुई। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य टिहरी की जनता को राजनीतिक रूप से एकजुट करना और उन्हें नागरिक अधिकारों और लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना था। प्रजामंडल ने लोगों की शिकायतों को सार्वजनिक मंच पर रखा और राजा के निरंकुश शासन को चुनौती दी।

श्रीदेव सुमन का नेतृत्व: श्रीदेव सुमन इस आंदोलन के निर्विवाद नेता बनकर उभरे। उन्होंने प्रजामंडल का नेतृत्व किया और टिहरी की जनता को यह समझाया कि लोकतंत्र और न्याय के लिए लड़ना कितना जरूरी है। उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों का पालन करते हुए टिहरी नरेश के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया। उनका नेतृत्व जनता के लिए एक आशा की किरण था, जिसने उन्हें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस दिया।

84 दिन का अनशन और बलिदान: अपने आंदोलन के दौरान श्रीदेव सुमन को गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया। उन्होंने जेल के भीतर भी अपने संघर्ष को जारी रखा और भूख हड़ताल शुरू कर दी। राजा के अत्याचारों के विरोध में उनका अनशन 84 दिनों तक चला। आखिरकार, 25 जुलाई 1944 को उनकी मृत्यु हो गई। उनके इस महान बलिदान ने न केवल टिहरी के आंदोलन को और भी अधिक शक्तिशाली बनाया, बल्कि वे पूरे देश में स्वतंत्रता और न्याय के प्रतीक बन गए।

रियासत का भारत में विलय: श्रीदेव सुमन के बलिदान के बाद आंदोलन और भी तेज हो गया। उनके बलिदान ने टिहरी की जनता में एक नई ऊर्जा और आक्रोश भर दिया। परिणामस्वरूप, राजा को झुकना पड़ा और लोकतंत्र की मांग माननी पड़ी। आखिरकार, 1949 में, टिहरी रियासत का भारत संघ में विलय हो गया, जिससे राजशाही का अंत हुआ और टिहरी एक लोकतांत्रिक भारत का हिस्सा बन गया।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, टिहरी राज्य में स्वतंत्रता संग्राम एक ऐसे आंदोलन का उदाहरण है जो प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के बाहर लड़ा गया था। श्रीदेव सुमन ने प्रजामंडल की स्थापना करके और अपने जीवन का बलिदान देकर टिहरी की जनता को संगठित किया और उन्हें अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। उनका 84 दिनों का अनशन और उसके बाद उनकी शहादत टिहरी के स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ थी, जिसने इस क्षेत्र को लोकतंत्र की ओर अग्रसर किया और अंततः भारत संघ में इसका विलय संभव हुआ।

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