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कुली बेगार प्रथा: शोषण के विरुद्ध एक ऐतिहासिक संघर्ष

प्रस्तावना:

भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान कई शोषणकारी प्रणालियाँ प्रचलित थीं, और इन्हीं में से एक थी ‘कुली बेगार’ प्रथा। यह एक क्रूर और अमानवीय व्यवस्था थी, जिसने विशेष रूप से उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के जीवन को अत्यधिक कष्टमय बना दिया था। कुली बेगार ब्रिटिश अधिकारियों, उनके सामान और मेहमानों के लिए स्थानीय लोगों को बिना किसी वेतन के जबरन काम करने पर मजबूर करती थी। यह प्रथा न केवल आर्थिक शोषण का प्रतीक थी, बल्कि इसने मानवीय गरिमा को भी बुरी तरह से ठेस पहुँचाई।

अमानवीय शोषण: ‘कुली बेगार’ के तहत, ग्रामीणों को ब्रिटिश अधिकारियों के लिए उनकी यात्रा के दौरान बिना किसी भुगतान के भारी सामान ढोना पड़ता था। इस प्रथा के तहत उन्हें भोजन या आवास भी नहीं मिलता था, और अक्सर उन्हें अपने घर से दूर, खराब मौसम में भी काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। यह व्यवस्था औपनिवेशिक शोषण का एक स्पष्ट उदाहरण थी, जिसने पहाड़ी आबादी में गहरा असंतोष पैदा किया।

विरोध का प्रतीक: कुली बेगार के खिलाफ उत्तराखंड के लोगों का संघर्ष सिर्फ एक आर्थिक लड़ाई नहीं था, बल्कि यह उनके सम्मान और आत्म-सम्मान की रक्षा का भी संघर्ष था। यह प्रथा ब्रिटिश अधिकारियों की क्रूरता और प्रभुत्व का प्रतीक बन गई थी, और इसे खत्म करना स्वतंत्रता और गरिमा की प्राप्ति के लिए आवश्यक था।

ऐतिहासिक उत्तरैनी मेलाकी घटना: कुली बेगार प्रथा के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक विरोध 1921 में बागेश्वर में उत्तरैनी मेले के दौरान हुआ। बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में हजारों लोग इस मेले में इकट्ठा हुए। इसी भीड़ में, लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से उन सभी ‘कुली रजिस्टर’ को, जिनमें बेगार के लिए लोगों के नाम दर्ज थे, सरयू नदी में बहा दिया।

संगठित आंदोलन का प्रतीक: कुली रजिस्टर को नदी में बहाने की यह घटना केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि यह कुली बेगार प्रथा को सामूहिक रूप से अस्वीकार करने का एक सशक्त संदेश था। इस ऐतिहासिक कार्य ने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि वे संगठित होकर ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध कर सकते हैं। यह उत्तराखंड के इतिहास में सबसे पहले संगठित और अहिंसक प्रतिरोध आंदोलनों में से एक था।

स्वतंत्रता आंदोलन का मोड़: कुली बेगार के खिलाफ यह सफल विरोध उत्तराखंड के स्वतंत्रता आंदोलन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस घटना ने लोगों में आत्मविश्वास और एकता की भावना जगाई, जिसने बाद में अन्य उपनिवेश-विरोधी संघर्षों को प्रेरित किया। इसके बाद, उत्तराखंड के लोग राष्ट्रीय आंदोलन में अधिक सक्रियता से भाग लेने लगे, और इस क्षेत्र में राजनीतिक चेतना और भी मजबूत हुई।

निष्कर्ष:

निष्कर्ष के तौर पर, कुली बेगार प्रथा ब्रिटिश शासन की एक क्रूर और अमानवीय व्यवस्था थी। हालांकि, उत्तराखंड के लोगों ने बद्रीदत्त पांडे और अन्य नेताओं के नेतृत्व में इस शोषण के खिलाफ एकजुट होकर ऐतिहासिक प्रतिरोध किया। बागेश्वर की घटना, जहाँ कुली रजिस्टर को नदी में बहा दिया गया, ने एक शक्तिशाली संदेश दिया कि लोग अब अत्याचार को सहन नहीं करेंगे। इस सफल विरोध ने न केवल कुली बेगार को समाप्त किया, बल्कि उत्तराखंड को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण स्थान भी दिलाया।

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