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कुली बेगार आंदोलन: शोषण के विरुद्ध एक ऐतिहासिक संघर्ष

प्रस्तावना:

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में, केवल बड़े आंदोलनों ने ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर चले संघर्षों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तराखंड में, ऐसा ही एक आंदोलन था ‘कुली बेगार आंदोलन’, जो 1921 में कुमाऊँ क्षेत्र में ब्रिटिश शोषण के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन बन गया। यह आंदोलन इस बात का प्रतीक था कि आम जनता भी अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ सकती है। इसने उत्तराखंड के लोगों में राष्ट्रीय चेतना को जगाया और उन्हें मुख्य स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा।

शोषण की अमानवीय प्रथा: ‘कुली बेगार’ प्रथा ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा चलाया गया एक क्रूर और अमानवीय शोषण था। इस प्रथा के तहत, ब्रिटिश अधिकारी स्थानीय ग्रामीणों को बिना किसी भुगतान के उनके लिए भार ढोने के लिए मजबूर करते थे। उन्हें पहाड़ी इलाकों में भारी सामान लेकर चलना पड़ता था, और इसके बदले में उन्हें न तो वेतन मिलता था और न ही कोई सम्मान। यह व्यवस्था उत्तराखंड की पहाड़ी आबादी के लिए अत्यधिक कष्टप्रद थी और ब्रिटिश शोषण का एक स्पष्ट उदाहरण थी।

उत्तराखंड के नेताओं का नेतृत्व: इस शोषण के खिलाफ लोगों को एकजुट करने में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविंद पंत और चिरंजीलाल जैसे स्थानीय नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। उनके नेतृत्व में, ग्रामीणों ने यह महसूस किया कि वे संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।

सामूहिक अस्वीकृति का साहसिक कार्य: आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर में सरयू और गोमती नदी के संगम पर हुआ। उत्तरायणी मेले के दौरान, हजारों लोग एकत्रित हुए। बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में, लोगों ने प्रतीकात्मक रूप से उन सभी ‘कुली रजिस्टरों’ को, जिनमें बेगार के लिए ग्रामीणों के नाम दर्ज थे, नदी में बहा दिया। इस साहसिक कार्य ने ब्रिटिश अधिकारियों को चकित कर दिया, और यह प्रथा को सामूहिक रूप से अस्वीकार करने का एक शक्तिशाली संदेश था।

बड़ी सफलता और परिणाम: इस सफल प्रतिरोध के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और कुली बेगार प्रथा को समाप्त करना पड़ा। यह उत्तराखंड के लोगों के लिए एक बड़ी विजय थी और इसने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि अहिंसक और संगठित प्रतिरोध से भी बड़े लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है। इस जीत ने लोगों में आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान की भावना को बढ़ाया।

राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव: कुली बेगार आंदोलन सिर्फ एक स्थानीय संघर्ष नहीं था। इसने उत्तराखंड में राष्ट्रवादी भावना को बढ़ाया और लोगों को बड़े भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से सीधे तौर पर जोड़ा। इस आंदोलन की सफलता ने अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे ही स्थानीय आंदोलनों को प्रेरित किया। इसने यह साबित कर दिया कि स्थानीय संघर्ष भी राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

निष्कर्ष:

संक्षेप में, कुली बेगार आंदोलन उत्तराखंड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह आंदोलन ब्रिटिश शोषण के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध का प्रतीक था। बद्रीदत्त पांडे और अन्य नेताओं के नेतृत्व में, लोगों ने बिना हिंसा के अपनी एकता और दृढ़ता से एक अमानवीय प्रथा को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन ने न केवल कुली बेगार का अंत किया, बल्कि उत्तराखंड के लोगों को स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा संघर्ष लड़ने के लिए प्रेरित किया, जिससे यह क्षेत्र भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक गौरवशाली हिस्सा बन गया।

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