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कुमाऊँ परिषद्: उत्तराखंड में राष्ट्रीय आंदोलन का आधार

प्रस्तावना:

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, क्षेत्रीय संगठनों ने राष्ट्रीय चेतना को जगाने और स्थानीय समस्याओं को बड़े आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तराखंड में, इस तरह के एक संगठन, कुमाऊँ परिषद् की स्थापना ने क्षेत्र के लोगों को राजनीतिक रूप से संगठित करने और उन्हें राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। इस संगठन ने न केवल स्थानीय मुद्दों को उठाया, बल्कि भविष्य के नेताओं के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी कार्य किया।

स्थापना और नेतृत्व: 1916 में नैनीताल में गोविंद बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पांडे और हरगोविंद पंत जैसे युवा और दूरदर्शी नेताओं द्वारा कुमाऊँ परिषद् की स्थापना की गई थी। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य कुमाऊँ क्षेत्र की समस्याओं को संबोधित करना और स्थानीय लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करना था। इसने उत्तराखंड में राजनीतिक गतिविधियों को एक नई दिशा दी और एक मजबूत नेतृत्व का उदय हुआ।

स्थानीय मुद्दों पर ध्यान: परिषद् ने कुली बेगार (अवैतनिक और जबरन श्रम), जंगल से संबंधित कानूनों और भू-राजस्व निपटान जैसी स्थानीय समस्याओं पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। ब्रिटिश सरकार की इन दमनकारी नीतियों के कारण आम जनता में गहरा असंतोष था, और परिषद् ने इन मुद्दों को उठाकर लोगों की शिकायतों को संगठित विरोध का रूप दिया। इस तरह, इसने स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा।

संगठित आंदोलन और जागरूकता: कुमाऊँ परिषद् ने लोगों को जागरूक करने के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों, बैठकों और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया। इन आयोजनों के माध्यम से, इसने ब्रिटिश सरकार की नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार किया और लोगों को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित किया। इन गतिविधियों ने उत्तराखंड के लोगों को यह महसूस कराया कि वे भी बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

राजनीतिक प्रशिक्षण का मंच: यह परिषद् उत्तराखंड के कई भविष्य के नेताओं के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रशिक्षण केंद्र साबित हुई। गोविंद बल्लभ पंत जैसे नेताओं ने यहाँ से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिषद् ने युवा कार्यकर्ताओं को नेतृत्व, संगठन और संघर्ष का ज्ञान दिया, जिससे वे आगे चलकर कुशल नेता बन सके।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय: 1926 में, कुमाऊँ परिषद् ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कर लिया। यह एक ऐतिहासिक कदम था जिसने कुमाऊँ के आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा। इस विलय के बाद, उत्तराखंड के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे सभी आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया, जिससे इस क्षेत्र की भूमिका  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में और भी मजबूत हो गई।

निष्कर्ष:

निष्कर्ष के तौर पर, कुमाऊँ परिषद् ने उत्तराखंड में राष्ट्रीय चेतना को जगाने और उसे संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा, लोगों को जागरूक किया और भविष्य के नेताओं को तैयार किया। इसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय उत्तराखंड के लिए एक निर्णायक क्षण था, जिसने इस क्षेत्र को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। कुमाऊँ परिषद् का योगदान उत्तराखंड के इतिहास में एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसने यहाँ के लोगों को संगठित होकर अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।

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