उत्तराखंड का इतिहास वनों की रक्षा और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों के लिए किए गए संघर्षों की एक प्रेरणादायक गाथा है। यहाँ के आंदोलनों ने विश्व को पर्यावरण संरक्षण के नए तरीके सिखाए हैं।
- आंदोलनों का मुख्य केंद्र: उत्तराखंड के वन आंदोलन मुख्य रूप से ‘जल, जंगल और जमीन‘ पर स्थानीय निवासियों के पारंपरिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़े गए।
- कुंजणी वन आंदोलन (1903-04): टिहरी रियासत में अमर सिंह के नेतृत्व में यह आंदोलन राजस्व करों में वृद्धि और वन अधिकारों के हनन के विरोध में शुरू हुआ था।
- खास पट्टी वन आंदोलन (1906-07): गढ़वाल क्षेत्र में हुए इस आंदोलन में जनता इतनी आक्रोशित थी कि उन्होंने वन अधिकारी सदानंद गैरोला को रस्सी से बांध दिया था।
- कुमाऊँ संघ (1916): वन समस्याओं के समाधान हेतु गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में कुमाऊँ संघ की स्थापना की गई, जिसने ब्रिटिश सरकार के समक्ष स्थानीय लोगों की आवाज उठाई।
- फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी (1921): जनता के वन संबंधी कष्टों की जांच के लिए पी. विंढम की अध्यक्षता में इस कमेटी का गठन हुआ, जिसने 1926 में अपनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश की।
- वन पंचायतों का गठन (1931): ग्रीवेन्स कमेटी की सिफारिश पर मद्रास मॉडल की तर्ज पर उत्तराखंड में वन पंचायतों की शुरुआत हुई। चमोली में 1932 में पहली बार इनका गठन हुआ।
- तिलाड़ी कांड (30 मई 1930): टिहरी रियासत के रंवाई क्षेत्र में वन अधिकारों की मांग कर रहे निहत्थे किसानों पर दीवान चक्रधर जुयाल ने गोलियाँ चलवाईं, जिसमें सैकड़ों लोग शहीद हुए।
- उत्तराखंड का जलियांवाला: तिलाड़ी कांड की भयावहता और क्रूरता के कारण इसे ‘उत्तराखंड का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।
- चिपको आंदोलन (1973-74): यह विश्वप्रसिद्ध आंदोलन चमोली के रैणी गाँव से शुरू हुआ, जहाँ महिलाओं ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपककर विरोध जताया।
- नेतृत्व और वैश्विक पहचान: इस आंदोलन का नेतृत्व गौरा देवी ने किया, जिसे बाद में चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने वैश्विक पहचान दिलाई।
- आंदोलन का प्रसिद्ध नारा: “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार” चिपको आंदोलन का मूल मंत्र बना।
- सम्मान और पुरस्कार: पर्यावरण सेवा के लिए 1982 में चंडी प्रसाद भट्ट को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, जबकि सुंदरलाल बहुगुणा ने 1981 में पद्मश्री स्वीकार करने से मना कर दिया था।
- डूंगी-पैंतोली आंदोलन (1980): चमोली की महिलाओं ने बांज (Oak) के वनों को काटकर वहां चीड़ के व्यावसायिक वृक्षारोपण के सरकारी निर्णय को अपने कड़े विरोध से बदलवा दिया।
- पाणी राखो आंदोलन: पौड़ी गढ़वाल के उफरैंखाल में सच्चिदानंद भारती ने जल संरक्षण और वनीकरण के माध्यम से सूखे क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने का सफल मॉडल पेश किया।
- रक्षा सूत्र आंदोलन (1994): टिहरी के भिलंगना क्षेत्र में सुरेश भाई के नेतृत्व में लोगों ने पेड़ों पर ‘रक्षा सूत्र’ बांधकर उनके संरक्षण का संकल्प लिया।
- मैती आंदोलन (1995): कल्याण सिंह रावत द्वारा ग्वालदम से शुरू किया गया यह आंदोलन विवाह की रस्मों को वृक्षारोपण से जोड़ता है। ‘मैती’ का अर्थ ‘मायका’ होता है।
- मैती परंपरा: इस आंदोलन के तहत वधू विवाह के समय मायके में एक पौधा लगाती है, जिसकी देखभाल उसकी सहेलियाँ और मायके वाले करते हैं।
- झपटो-छीनो आंदोलन (1998): चमोली के लाता गाँव में नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के कारण छीने गए चारागाह और जड़ी-बूटी संग्रहण के अधिकारों की बहाली के लिए ग्रामीणों ने यह संघर्ष किया।
- महिलाओं की भूमिका: उत्तराखंड के लगभग सभी वन आंदोलनों में महिलाओं ने अग्रिम पंक्ति में रहकर संघर्ष किया, जिससे इन्हें एक सामाजिक शक्ति मिली।
निष्कर्ष:
इन आंदोलनों ने सिद्ध किया कि वनों का वास्तविक संरक्षण केवल सरकारी तंत्र से नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के सहयोग और उनके अधिकारों के सम्मान से ही संभव है।
वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी
- उत्तराखंड के वन आंदोलनों के मुख्य उद्देश्य और केंद्र क्या रहे हैं?
- स्थानीय निवासियों के ‘जल, जंगल और जमीन’ के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना।
- संवैधानिक अधिकारों की बहाली के लिए संघर्ष करना।
- ब्रिटिश और रियासती शासन की कठोर वन नीतियों का विरोध करना।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- प्रारंभिक आंदोलनों (कुंजणी और खास पट्टी) के संदर्भ में कौन सा कथन सही है?
- कुंजणी आंदोलन (1903-04) का नेतृत्व अमर सिंह ने किया था।
- खास पट्टी आंदोलन (1906-07) के दौरान वन अधिकारी सदानंद गैरोला को रस्सी से बांध दिया गया था।
- ये आंदोलन टिहरी रियासत और गढ़वाल क्षेत्र के वन अधिकारों के हनन के विरोध में थे।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- कुमाऊँ संघ (1916) और फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी (1921) के बारे में क्या सत्य है?
- कुमाऊँ संघ की स्थापना गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में की गई थी।
- फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी का गठन पी. विंढम की अध्यक्षता में हुआ था।
- इन संस्थाओं का मुख्य उद्देश्य जनता के वन संबंधी कष्टों की जांच और समाधान करना था।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- उत्तराखंड में ‘वन पंचायतों‘ के गठन (1931) के संबंध में सही तथ्य चुनें:
- इनका गठन फॉरेस्ट ग्रीवेन्स कमेटी की सिफारिश पर किया गया था।
- यह व्यवस्था ‘मद्रास मॉडल’ की तर्ज पर शुरू की गई थी।
- चमोली जिले में 1932 में पहली बार वन पंचायत का गठन हुआ।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- तिलाड़ी कांड (30 मई 1930) के बारे में कौन सा कथन सही है?
- इसे ‘उत्तराखंड का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।
- दीवान चक्रधर जुयाल ने निहत्थे किसानों पर गोलियाँ चलवाई थीं।
- यह कांड टिहरी रियासत के रंवाई क्षेत्र में वन अधिकारों की मांग के दौरान हुआ था।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- विश्वप्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन‘ (1973-74) की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
- इसकी शुरुआत चमोली के रैणी गाँव से हुई और नेतृत्व गौरा देवी ने किया।
- “मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार” इस आंदोलन का मुख्य नारा था।
- चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- चिपको आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को मिले सम्मान के संदर्भ में क्या सत्य है?
- चंडी प्रसाद भट्ट को 1982 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- सुंदरलाल बहुगुणा ने 1981 में पद्मश्री पुरस्कार स्वीकार करने से मना कर दिया था।
- इन पुरस्कारों और कार्यों ने उत्तराखंड के आंदोलनों को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- ‘मैती आंदोलन‘ (1995) और इसकी परंपरा के बारे में सही विकल्प चुनें:
- इसकी शुरुआत कल्याण सिंह रावत द्वारा ग्वालदम (चमोली) से की गई थी।
- इसमें विवाह के समय वधू द्वारा मायके में एक पौधा लगाने की अनूठी परंपरा है।
- ‘मैती’ शब्द का स्थानीय अर्थ ‘मायका’ होता है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- रक्षा सूत्र और पाणी राखो आंदोलन के संदर्भ में कौन से तथ्य सही हैं?
- रक्षा सूत्र आंदोलन (1994) का नेतृत्व सुरेश भाई ने भिलंगना क्षेत्र में किया था।
- पाणी राखो आंदोलन सच्चिदानंद भारती द्वारा उफरैंखाल (पौड़ी) में चलाया गया।
- ये आंदोलन क्रमशः पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधने और जल संरक्षण के सफल मॉडल हैं।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी
- डूंगी-पैंतोली (1980) और झपटो-छीनो (1998) आंदोलनों के बारे में क्या सही है?
- डूंगी-पैंतोली आंदोलन बांज (Oak) के वनों को बचाने के लिए महिलाओं द्वारा किया गया।
- झपटो-छीनो आंदोलन नंदा देवी नेशनल पार्क के कारण छीने गए पारंपरिक अधिकारों की बहाली के लिए था।
- इन आंदोलनों ने सिद्ध किया कि वनों का संरक्षण स्थानीय समुदायों के सहयोग के बिना असंभव है।
- उपरोक्त सभी
उत्तर: D. उपरोक्त सभी