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उत्तराखंड की चित्रकला: प्रमुख विशेषताएँ

उत्तराखंड की चित्रकला यहाँ की गहरी सांस्कृतिक जड़ों और हिमालयी सुंदरता का एक अद्भुत समन्वय है। यह मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित है: एक जो आम जनमानस के घरों की दीवारों और आंगनों में ‘लोक कला’ के रूप में जीवित है, और दूसरी वह जो ‘गढ़वाल शैली’ के रूप में महलों और संग्रहालयों की शोभा बढ़ाती है।

  1. लोक अभिव्यक्ति का माध्यम: उत्तराखंड की चित्रकला मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक उत्सवों से जुड़ी है, जो शुभता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
  2. ऐपण (Aipan): यह कुमाऊँ की सबसे लोकप्रिय लोक कला है। इसे गेरू (लाल मिट्टी) से रंगे गए धरातल पर बिस्वार (चावल के घोल) से उकेरा जाता है।
  3. ऐपण के प्रतीक: इसमें स्वास्तिक, शंख, चक्र, सूर्य-चंद्रमा और देवी लक्ष्मी के पदचिह्न जैसे मांगलिक प्रतीकों का प्रयोग बहुतायत में होता है।
  4. चौकी कला: पूजा के समय देवी-देवताओं को विराजमान करने के लिए विशेष कलात्मक आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जिन्हें ‘चौकी’ (जैसे सरस्वती या लक्ष्मी चौकी) कहा जाता है।
  5. वसुधारा: घरों के फर्श और पूजा स्थलों के चारों ओर बनाई जाने वाली सफेद धाराएँ ‘वसुधारा’ कहलाती हैं, जो निरंतरता और प्रवाह का संकेत देती हैं।
  6. थापा (Thapa): यह दीवारों पर बनाई जाने वाली चित्रकला है, जिसमें नंदा देवी और गोलू देवता जैसे स्थानीय लोक देवताओं का भव्य चित्रण किया जाता है।
  7. ज्यूँति-मातृका: विवाह और जनेऊ जैसे संस्कारों में दीवारों पर सप्तमातृकाओं (सात देवियों) का चित्रण किया जाता है, ताकि मांगलिक कार्य निर्विघ्न संपन्न हों।
  8. द्वार पत्र (खोली): घर के मुख्य प्रवेश द्वार को ‘खोली’ के चित्रों से सजाया जाता है। इसमें गणेश और कलश की आकृतियाँ घर में सुख-शांति का आमंत्रण मानी जाती हैं।
  9. बरा-बूंद कला: विवाह के समय कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को भेंट किए जाने वाले पट्टों पर की जाने वाली यह चित्रकारी दोनों परिवारों के मिलन का प्रतीक है।
  10. पिछौरा (Pichora): कुमाऊँनी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले इस पारंपरिक परिधान पर हाथ से की जाने वाली चित्रकारी और छपाई उत्तराखंड की विशिष्ट कला दृष्टि को दर्शाती है।
  11. प्राचीनतम साक्ष्य: उत्तराखंड में चित्रकला की जड़ें प्रागैतिहासिक काल तक जाती हैं, जिसके प्रमाण लाखु उडियार (अल्मोड़ा) और ग्वारख्या गुफा (चमोली) के शैल चित्रों में मिलते हैं।
  12. गढ़वाल चित्रकला शैली: यह 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई एक दरबारी कला है, जो ‘पहाड़ी चित्रकला’ की एक गौरवशाली उपशैली मानी जाती है।
  13. मोलाराम तोमर (1743-1833): गढ़वाल शैली के सबसे महान चित्रकार, कवि और दार्शनिक मोलाराम थे। उन्होंने श्रीनगर में अपनी चित्रशाला स्थापित की थी।
  14. दरबारी संरक्षण: गढ़वाल के पंवार राजाओं, विशेषकर प्रद्युम्न शाह और सुदर्शन शाह ने चित्रकला की इस शैली को फलने-फूलने के लिए राजकीय संरक्षण प्रदान किया।
  15. चैतू और माणकू: मोलाराम के समकालीन ये दो महान कलाकार अपनी सूक्ष्म रेखांकन शैली के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी कृतियों में ‘रुक्मिणी हरण’ और ‘कृष्ण लीला’ प्रमुख हैं।
  16. नायिका भेद: गढ़वाल शैली के चित्रों में महिलाओं के सौंदर्य का चित्रण अत्यंत कोमलता से किया गया है, जिसमें ‘अभिसारिका’ और ‘चंद्रमुखी’ जैसे चित्र प्रसिद्ध हैं।
  17. रंगों का चयन: जहाँ लोक कला में प्राकृतिक रंगों (चावल, हल्दी, गेरू) का प्रयोग होता है, वहीं गढ़वाल शैली में चटक और कोमल रंगों का सुंदर मिश्रण देखा जाता है।
  18. साहित्यिक प्रभाव: मोलाराम ने न केवल चित्र बनाए बल्कि ‘गढ़ राजवंश काव्य’ जैसे ग्रंथों की रचना भी की, जो कला और साहित्य के अद्भुत संगम का उदाहरण है।
  19. आधुनिक प्रयास: वर्तमान में ऐपण जैसी कलाओं को व्यावसायिक रूप दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय कलाकारों को रोजगार मिल रहा है और यह विरासत आधुनिक घरों तक पहुँच रही है।

निष्कर्ष:

उत्तराखंड की चित्रकला ‘देवभूमि’ की आध्यात्मिक और प्राकृतिक सुंदरता का सार है। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होकर आज भी अपनी मौलिकता बनाए हुए है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1: कुमाऊँ की प्रसिद्ध लोक कला ऐपण‘ (Aipan) के बारे में कौन से तथ्य सही हैं?

  1. इसे गेरू (लाल मिट्टी) और बिस्वार (चावल के घोल) से बनाया जाता है।
  2. इसमें स्वास्तिक, शंख और लक्ष्मी के पदचिह्न जैसे प्रतीकों का प्रयोग होता है।
  3. यह मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक उत्सवों से जुड़ी है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 2: ‘वसुधाराचित्रकला शैली की विशेषता क्या है?

  1. यह घरों के फर्श और पूजा स्थलों के चारों ओर बनाई जाती है।
  2. यह सफेद धाराओं के रूप में बनाई जाने वाली कला है।
  3. यह जीवन में निरंतरता और प्रवाह का संकेत देती है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 3: उत्तराखंड की गढ़वाल चित्रकला शैलीके संदर्भ में क्या सत्य है?

  1. यह 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई एक दरबारी कला है।
  2. यह ‘पहाड़ी चित्रकला’ की एक महत्वपूर्ण उपशैली मानी जाती है।
  3. इसे पंवार राजाओं (जैसे सुदर्शन शाह) का राजकीय संरक्षण प्राप्त था।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 4: गढ़वाल शैली के महान चित्रकार मोलाराम तोमरके बारे में क्या सही है?

  1. वे एक महान चित्रकार होने के साथ-साथ कवि और दार्शनिक भी थे।
  2. उन्होंने श्रीनगर (गढ़वाल) में अपनी चित्रशाला स्थापित की थी।
  3. उन्होंने ‘गढ़ राजवंश काव्य’ जैसे ग्रंथों की रचना की थी।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 5: ‘ज्यूँति-मातृकाचित्रकला का महत्व किन अवसरों पर होता है?

  1. विवाह जैसे मांगलिक संस्कारों के समय।
  2. जनेऊ (यज्ञोपवीत) संस्कार के अवसर पर।
  3. दीवारों पर सप्तमातृकाओं (सात देवियों) के चित्रण के लिए।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 6: उत्तराखंड में चित्रकला के प्राचीनतम साक्ष्य (शैल चित्र) कहाँ मिलते हैं?

  1. लाखु उडियार (अल्मोड़ा)
  2. ग्वारख्या गुफा (चमोली)
  3. प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं में
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 7: ‘पिछौरा‘ (PichorA. कला के संबंध में कौन से कथन सत्य हैं?

  1. यह कुमाऊँनी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाला पारंपरिक परिधान है।
  2. इस पर हाथ से विशेष चित्रकारी और छपाई की जाती है।
  3. यह उत्तराखंड की विशिष्ट कला और संस्कृति का प्रतीक है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 8: गढ़वाल शैली के चित्रकार चैतू और माणकूकी कृतियों के मुख्य विषय क्या थे?

  1. कृष्ण लीला
  2. रुक्मिणी हरण
  3. सूक्ष्म रेखांकन और पौराणिक कथाएं
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 9: ‘द्वार पत्र‘ (खोली) चित्रकला के पीछे क्या मान्यता है?

  1. यह घर के मुख्य प्रवेश द्वार को सजाने के लिए बनाई जाती है।
  2. इसमें गणेश और कलश की आकृतियाँ सुख-शांति का प्रतीक मानी जाती हैं।
  3. यह घर में समृद्धि के आमंत्रण का एक माध्यम है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 10: उत्तराखंड की लोक कलाऔर गढ़वाल शैलीके बीच मुख्य अंतर क्या है?

  1. लोक कला प्राकृतिक रंगों (हल्दी, गेरू) का उपयोग करती है, जबकि गढ़वाल शैली में रंगों का सूक्ष्म मिश्रण होता है।
  2. लोक कला जनमानस के घरों से जुड़ी है, जबकि गढ़वाल शैली महलों और दरबारों से जुड़ी थी।
  3. लोक कला का आधार धार्मिक अनुष्ठान हैं, जबकि गढ़वाल शैली में ‘नायिका भेद’ और सौंदर्य चित्रण प्रमुख है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

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