प्रस्तावना:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थी; इसमें महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। उत्तराखंड की महिलाओं ने भी इस राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने न केवल अपने घरों की जिम्मेदारी संभाली, बल्कि वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में भी सक्रिय रूप से शामिल हुईं। उनके साहस, दृढ़ता और बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई ऊर्जा दी और इसे एक सच्चा जन-आंदोलन बना दिया।
पहली महिला क्रांतिकारी – बिशनी देवी शाह: उत्तराखंड में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली पहली महिला स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बिशनी देवी शाह थीं। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान सक्रिय भागीदारी निभाई और अपने नेतृत्व से महिलाओं को प्रेरित किया। उन्हें अपने क्रांतिकारी कार्यों के लिए जेल जाना पड़ा, जिससे वे उत्तराखंड की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गईं। उनकी गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया कि महिलाएं भी इस लड़ाई में पीछे नहीं थीं।
श्यामा वत्स का जन-जागरण: श्यामा वत्स ने अपनी ऊर्जा और उत्साह से गांव-गांव जाकर महिलाओं को एकजुट किया। उन्होंने उन्हें खादी पहनने, स्वदेशी अपनाने और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से बड़ी संख्या में महिलाएं आंदोलन में शामिल हुईं, जिससे इसकी पहुँच और भी व्यापक हो गई। श्यामा वत्स ने ग्रामीण महिलाओं को समझाया कि उनकी भागीदारी राष्ट्रीय आंदोलन की सफलता के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
लाठियाँ खाने को तैयार महिलाएं: 1930 में, जब सविनय अवज्ञा आंदोलन अपने चरम पर था, अल्मोड़ा में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान, महिलाओं ने अपनी हिम्मत का प्रदर्शन किया। पुरुषों की तरह, वे भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारे लगा रही थीं और तिरंगा फहराने की कोशिश कर रही थीं। जब पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, तो वे पीछे नहीं हटीं और लाठियाँ खाकर भी अपने प्रदर्शन पर डटी रहीं। यह घटना महिलाओं के दृढ़ संकल्प और साहस का एक शक्तिशाली प्रतीक है।
आंदोलन को जन-समर्थन: महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक व्यापक जन-समर्थन दिलाया। जब घरों से महिलाएं बाहर निकलीं और विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुईं, तो इसने समाज के हर वर्ग को आंदोलन से जोड़ा। महिलाओं ने न केवल विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया, बल्कि उन्होंने जेल गए नेताओं के परिवारों की देखभाल की और गुप्त रूप से संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने में भी मदद की।
बलिदान और प्रेरणा का स्रोत: उत्तराखंड की कई महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन बलिदान किया। उनके बलिदान ने न केवल उस समय के आंदोलनकारियों को प्रेरित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया। उनके योगदान ने यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता की लड़ाई में लिंग भेद नहीं होता और महिलाएं भी राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकती हैं।
निष्कर्ष:
संक्षेप में, उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण और गौरवशाली भूमिका निभाई। बिशनी देवी शाह और श्यामा वत्स जैसी नेताओं ने अपने साहस और दृढ़ संकल्प से महिलाओं को संगठित किया और उन्हें आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनके योगदान ने न केवल स्थानीय संघर्षों को मजबूत किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा। उनका बलिदान और संघर्ष हमें हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता हमें महिलाओं और पुरुषों दोनों के सामूहिक प्रयासों से मिली है।