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उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास: प्रमुख साक्ष्य एवं राजवंश

उत्तराखंड का प्राचीन काल ऐतिहासिक संक्रमण का वह दौर है जहाँ पुरातात्विक साक्ष्यों का मिलन पौराणिक गाथाओं और शिलालेखों से होता है। यह काल राज्य की प्रारंभिक राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण का साक्षी है।

  1. पुरातात्विक खोजें और महाश्म संस्कृति: उत्तराखंड में प्राचीन काल का आरंभ महाश्म (Megalithic) संस्कृति से माना जाता है। 1877 में रिबेट कार्नक द्वारा द्वाराहाट (चंपावत) में खोजे गए लगभग 200 ‘कपमार्क्स’ (ओखली) इस संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं।
  2. ताम्र युग के अवशेष: राज्य के विभिन्न हिस्सों, जैसे बहादराबाद (हरिद्वार) और वनकोट (पिथौरागढ़), से ताम्र उपकरण और मानवाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। ये खोजें इस क्षेत्र में धातु युग की प्राचीनता को सिद्ध करती हैं।
  3. चित्रित धूसर मृदभांड (PGW): अलकनंदा घाटी के थापली और यमुना घाटी के पुरोला से प्राप्त धूसर मृदभांडों का संबंध इतिहासकार बी.बी. लाल ने महाभारत काल से जोड़ा है, जो इस क्षेत्र को लौह युग से जोड़ता है।
  4. ऋग्वैदिक संदर्भ: ऋग्वेद में उत्तराखंड का प्रथम लिखित उल्लेख मिलता है, जहाँ इसे देवभूमि और मनीषियों की पूर्ण भूमि कहकर संबोधित किया गया है।
  5. पुराणों में विभाजन: स्कंद पुराण में हिमालय को पाँच खंडों में बाँटा गया है, जिसमें केदारखंड (वर्तमान गढ़वाल) और मानसखंड (वर्तमान कुमाऊँ) का विस्तृत वर्णन है।
  6. बौद्ध साहित्य: बौद्ध ग्रंथों (पालि भाषा) में उत्तराखंड के लिए हिमवंत शब्द का प्रयोग किया गया है, जो इस क्षेत्र की भौगोलिक विशिष्टता को दर्शाता है।
  7. प्रथम प्रजाति – कोल: साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार, उत्तराखंड की प्राचीनतम प्रजाति कोल (मुंड या शबर) थी। ये नाग और लिंग पूजा में विश्वास रखते थे।
  8. किरात प्रजाति: कोल के बाद किरातों (भिल्ल) का प्रभुत्व रहा। महाभारत के वन पर्व के अनुसार, किरातों ने शिव के नेतृत्व में अर्जुन से युद्ध किया था।
  9. खस प्रजाति और सामाजिक प्रथाएँ: खसों के समय राज्य में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। इनमें ‘झटेला’ और ‘टिकुआ’ जैसी विशिष्ट सामाजिक प्रथाएँ प्रचलित थीं।
  10. कुणिंद वंश (प्रथम राजनीतिक शक्ति): उत्तराखंड में शासन करने वाली पहली संगठित राजनीतिक शक्ति कुणिंद थे। इनका सबसे प्रतापी राजा अमोघभूति था, जिसकी मुद्राएँ सुदूर क्षेत्रों तक प्राप्त हुई हैं।
  11. कुषाण और यौधेय शासन: तराई क्षेत्रों पर कुषाणों का अधिकार रहा, जिन्हें बाद में यौधेय शासकों ने पराजित किया। जौनसार-भावर से प्राप्त इनकी मुद्राओं पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।
  12. शीलवर्मन की अश्वमेध वेदी: गोत्रीय वंश के शासक शीलवर्मन ने देहरादून के जगतग्राम में विशाल अश्वमेध यज्ञ कराए थे, जिसके पुरातात्विक अवशेष आज भी सुरक्षित हैं।
  13. नाग और मौखरी वंश: 6वीं-7वीं सदी में गोपेश्वर त्रिशूल लेख के अनुसार नागों का शासन रहा, जिन्हें कन्नौज के मौखरी वंश ने विजित किया।
  14. पौरव राजवंश: ब्रह्मपुर राज्य (वर्तमान चमोली-पौड़ी क्षेत्र) पर पौरव वंश का शासन था। तालेश्वर ताम्रपत्र इनके प्रशासन और भूमि मापन प्रणालियों की महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
  15. कालसी शिलालेख: 257 ई.पू. का अशोक का शिलालेख देहरादून के कालसी में स्थित है। प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखित यह लेख इस क्षेत्र पर मौर्यों के प्रभाव को दर्शाता है।
  16. लाखामंडल अभिलेख: जौनसार क्षेत्र में स्थित यह शिलालेख राजकुमारी ईश्वरा से संबंधित है, जो यमुना घाटी में यदुवंश के शासन की पुष्टि करता है।
  17. त्रिशूल लेख: गोपेश्वर और बाड़ाहाट (उत्तरकाशी) के त्रिशूल लेख प्राचीन राजाओं की विजय गाथाओं और उनकी धार्मिक आस्थाओं के प्रतीक हैं।
  18. बद्रीकाश्रम विद्यापीठ: प्राचीन काल में यह वैदिक ज्ञान का महाकेंद्र था। पौराणिक मान्यता है कि व्यास गुफा में ही वेदव्यास ने पुराणों और महाभारत की रचना की थी।
  19. कण्वाश्रम का महत्व: मालिनी नदी के तट पर स्थित यह आश्रम सम्राट भरत का जन्मस्थल और महाकवि कालिदास की कर्मस्थली रहा है, जहाँ ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ की रचना हुई।
  20. निष्कर्ष: उत्तराखंड का प्राचीन इतिहास आध्यात्मिकता और शौर्य का मिश्रण है। विभिन्न पुरा प्रजातियों और राजवंशों के समन्वय ने ही इस क्षेत्र को ‘देवभूमि’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1. उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास के पुरातात्विक साक्ष्यों के बारे में कौन से तथ्य सही हैं?

  1. 1877 में रिबेट कार्नक ने द्वाराहाट में लगभग 200 ‘कपमार्क्स’ (ओखली) की खोज की।
  2. बहादराबाद (हरिद्वार) और वनकोट (पिथौरागढ़) से प्राचीन ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  3. पुरोला और थापली से प्राप्त चित्रित धूसर मृदभांडों (PGW) का संबंध महाभारत काल से जोड़ा गया है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 2. प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में उत्तराखंड के नामकरण के विषय में क्या सत्य है?

  1. ऋग्वेद में इस क्षेत्र को ‘देवभूमि’ और ‘मनीषियों की पूर्ण भूमि’ कहा गया है।
  2. स्कंद पुराण में इस क्षेत्र को केदारखंड (गढ़वाल) और मानसखंड (कुमाऊँ) में बाँटा गया है।
  3. पालि भाषा के बौद्ध ग्रंथों में उत्तराखंड के लिए ‘हिमवंत’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 3. उत्तराखंड की प्राचीनतम आदि-प्रजातियों के संदर्भ में कौन से विकल्प सही हैं?

  1. कोल (मुंड) को यहाँ की प्राचीनतम प्रजाति माना जाता है, जो नाग पूजा करते थे।
  2. किरातों को ‘भिल्ल’ भी कहा गया है, जिन्होंने शिव के नेतृत्व में अर्जुन से युद्ध किया था।
  3. खस प्रजाति के समय बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ और इनमें ‘टिकुआ’ जैसी प्रथाएँ प्रचलित थीं।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 4. कुणिंद राजवंश (प्रथम राजनीतिक शक्ति) के बारे में कौन सी जानकारी सही है?

  1. कुणिंद उत्तराखंड में शासन करने वाली पहली संगठित राजनीतिक शक्ति थी।
  2. अमोघभूति कुणिंद वंश का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा था।
  3. इस वंश की मुद्राएँ सुदूर क्षेत्रों तक प्राप्त हुई हैं, जो उनके प्रभाव को दर्शाती हैं।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 5. कुषाण, यौधेय और शीलवर्मन के शासन काल के बारे में क्या सत्य है?

  1. तराई क्षेत्रों पर कुषाणों का अधिकार था, जिन्हें यौधेय शासकों ने पराजित किया।
  2. यौधेय मुद्राओं पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।
  3. शीलवर्मन ने देहरादून के जगतग्राम में विशाल अश्वमेध यज्ञ कराए थे।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 6. कालसी शिलालेख और लाखामंडल अभिलेख के संदर्भ में कौन से तथ्य सही हैं?

  1. कालसी (देहरादून) में सम्राट अशोक का 257 ई.पू. का शिलालेख स्थित है।
  2. कालसी शिलालेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखित है।
  3. लाखामंडल अभिलेख राजकुमारी ईश्वरा से संबंधित है, जो यदुवंश के शासन की पुष्टि करता है।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 7. पौरव राजवंश और मध्यकालीन संक्रमण के साक्ष्यों के विषय में क्या सही है?

  1. पौरव वंश का शासन ब्रह्मपुर (चमोली-पौड़ी क्षेत्र) पर था।
  2. तालेश्वर ताम्रपत्र पौरव प्रशासन और भूमि मापन प्रणाली की जानकारी देते हैं।
  3. गोपेश्वर और बाड़ाहाट के त्रिशूल लेख प्राचीन राजाओं की विजय गाथाओं के प्रतीक हैं।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 8. उत्तराखंड के प्राचीन विद्यापीठों और साहित्यिक स्थलों के बारे में क्या सत्य है?

  1. बद्रीकाश्रम वैदिक ज्ञान का महाकेंद्र था, जहाँ व्यास गुफा में महाभारत की रचना हुई।
  2. कण्वाश्रम मालिनी नदी के तट पर स्थित सम्राट भरत का जन्मस्थल है।
  3. महाकवि कालिदास ने कण्वाश्रम में ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ की रचना की थी।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 9. प्राचीन उत्तराखंड की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के बारे में कौन से विकल्प सही हैं?

  1. यहाँ की प्राचीन प्रजातियाँ प्रकृति पूजा (नाग, लिंग, शिव) में गहरा विश्वास रखती थीं।
  2. मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का प्रभाव इस क्षेत्र में व्यापक रूप से बढ़ा।
  3. अश्वमेध यज्ञ और त्रिशूल लेख राजाओं की धार्मिक आस्थाओं को प्रदर्शित करते हैं।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

प्रश्न 10. उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास के समग्र निष्कर्ष के संदर्भ में क्या सही है?

  1. यह काल ऐतिहासिक संक्रमण, पौराणिक गाथाओं और पुरातात्विक साक्ष्यों का मिलन है।
  2. विभिन्न प्रजातियों और राजवंशों ने मिलकर इसकी सांस्कृतिक पहचान बनाई।
  3. आध्यात्मिक और शौर्य के मिश्रण ने ही इस क्षेत्र को ‘देवभूमि’ के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  4. उपरोक्त सभी

उत्तर: D. उपरोक्त सभी

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